भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 635

हे बालक नीची कला, तुमही बोलो ऊँच ।
दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥
महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन ।
दास गरीब मनी मरी, मैं अजिज आधीन ॥
मैं अविगत गतिसे परे, चारवेद से दूर ।
दास गरीब दशो दिशा, सकल सिन्धु भरपूर ॥
सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ ।
दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥
जात पाँत मेरे नहीं, नहीं स्त्री नहीं गाउँ ।
दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥
नाद विन्द मेरे नहीं, नहि गोद नहि गात ।
दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥
सब सङ्गी बिछुरु नहीं, आदि अन्त बहु जाँहि ।
दास गरीब सकल बसों, बाहर भीतर माँहि ॥
हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीरू ।
दास गरीब अधर बसूं, अविगत पुरुष कबीर ॥
अनन्त कोटिसलिता बडो, अनन्त कोटि घर ऊँच ।
दास गरीब सदा रहूँ, नहीं हमारे कूँच ॥
पुहमी धरनी अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर ।
दास गरीब न दूसरा, हम सम तुल नहि और ॥
मैं माया मैं कालहूँ, मैं हंसा मैं बंस ।
दास गरीब दयाल हम, हमहीं करें विध्वंस ॥
ममता माया हम रची, काल जाल सब जीव ।
दास गरीब प्राण पद, हम दासा तन पीव ॥
हम दासनके दास हैं, कर्ता पुरुष करीम ।
दास गरीब अवधूत हम, हम ब्रह्मचारी सीम ॥
हम मौला सब मुल्कमें, मुल्क हमारे माँहि ।
दास करीब दलाल हम, हम दूसर कछु नाँहि ॥
हम मोती मुक्ताहल, हम दरिया दरवेश ।
दास गरीब हम नित रहें हम तजि जात हमेश ॥
हमहीं लाल गुलाल है, हम पारस पद सार ।

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