भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 638

गरीबदास डूबे परे, पुस्तक लादे बैल ॥
कहो स्वामी कहाँ रहोगे, चौदह भुवन विहण्ड ।
गरीबदास बीजक कहो, चलत प्राण औ पिण्ड ॥
बोलत रामानन्दजी, सुन कबीर करतार ।
गरीब दास सब रूपमें, तुमहीं बोलनहार ।
तुम साहब तुम सन्त हो, तुम सद्गुरु हम हंस ।
गरीब दास तुम रूप विनु, और न पूजो बंस ॥
मैं भक्ता मुक्ता भया, किया कर्म कुल नाश ।
गरीब दास अविगत मिले, मिटी मनकी प्यास ॥
दोनों ठौरमें एक तू, भया एकसे दोय ।
गरीबदास हमकारने, उतरे मगम जोय ॥
बोले रामानन्दजी, सुनु कबीर सुजान ।
गरीबदास मुवित भयी, उधरे पिण्ड ओ प्राण ॥
गुष्ठि रामानन्दसे, काशीनगर मझार ।
गरीबदास जिन्द पीरकी, हम पाये दीदार ॥

पृ. २९६ में कबीर साहिबके १२ पन्थोंका सामान्य परिचय दिया जा चुका है अनुरागसागरकी भूमिकामें इनका विस्तारके साथ वर्णन किया है तथा उनकी परंपराभी दिखाई है उन्हींके विषयमें कथन है कि, बारहों पन्थोंके आचार्य हंस कबीर हैं। वे सब सद्गुरुके धामको पहुँचेंगे।

रहन सहन

भारतवर्षमें कबीर साहबके अनुयायी बहुत हैं। वे लोग वेद धर्मियोंके साथ मिले मिलाये रहते हैं। वे भ्रम भूतकी पूजासे दूर भागते हैं। वे तीर्थोंमें श्रद्धाके साथ जाते हैं। दान पुण्य आदि करते हैं। जो ठीक कबीरपन्थी नहीं, नाममात्रको कबीरपन्थी बन बैठे हैं उनके विचार तथा ध्यान दूसरेही प्रकारके हैं। कबीर साहबका कथन है कि, हे धर्मदास ! जिसमें तुम ऐसे चिन्ह पाओ उसको उपदेश दो। जिसमें भक्ति, दीनता, साधुसेवा, गुरुसेवा न हो उसको अपने हंसोंमें भूलकर भी स्थान न देना। जिस समय मित्र आदि रविदासजीके जब सब सहायक हार मान गये तब रविदासजीने सत्यगुरुको पहचाना। कपटियोंका भरोसा छोड़कर कबीर साहबके शिष्य हो परमानन्दमें बहने लगे।

भारतवर्षमें बहुत लोग हैं, जो अपनेको कबीरपन्थी कहते हैं, परन्तु उन लोगोंको आज्ञा है कि तुमलोग जब धर्मदास साहबके बचन चूड़ामणिदासकी