भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करतार रहता है । उसकी चार शाखायें हैं । तीसरा वेदनी कर्म है जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है । उसकी दो शाखायें हैं । चौथा मोहिनी कर्म है । उसकी दो शाखायें हैं । पांचवाँ आयुकर्म है इससे आपदाका अन्दाजा होता है, इसकी चार शाखायें हैं । छठवें नाम कर्म है इसकी तिरानवें शाखायें हैं । यह नामकर्म जीवधारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है । सातवाँ गौतकर्म है इस गौतकर्म की दो शाखायें हैं । एकसे नीची जगह और दूसरीसे ऊँची जगह जीव देह धरकरके उत्पन्न होता है । आठवाँ अन्तराय कर्म है उसकी दो शाखायें हैं । इस अन्तराय कर्मका यह काम है कि, जो ज्ञान होनेवाला है उसको न होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे । आठों कर्मोंका विवरण में ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले । इन्हीं आठ कर्मोंसे समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं कर्मोंपासना योग और ज्ञानभी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा गया है । जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि, इस जीवका आवागमन कैसे सुकार्य तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है । ये समस्त कर्म तो भरम रूप हैं । इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता । जिसका वेद धर्मके लोग और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं । इस जीवके कर्मही उसका स्वरूप बनाते हैं । कर्मोंही करके इस जीवका आवागमन चारोंखानिमें बराबर बना रहता है । सत्यगुरु भेद बतलावें तो आवागनको सम्बन्ध टूटे नहीं तो दुख पाता रहता है ।

मुसद्दस—तू है करतार किञ्त्रिया बारी । तेरा हुकम सब जगह जारी ॥
तेरी तसबीर सुबुक और भारी । नकशहा सब शिंगरफो जङ्गारी ॥
आलमोका है सारे काम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही इनसान हुआ तूही हैवान । तूही रहबर हुआ तूही शैतान ॥
जिस्म सदहा व एकही है जानू । होवे क्योकर बयां तुम्हारी शानू ॥
लोक तीनों दिया इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
मालिक व आदम व जिन्नो परी । हबशी हिन्दी व खेबर और ततरी ॥
रङ्ग विरङ्ग ढङ्ग चार खान करे । अदलो इनसाफ साफ साफ करे ॥
दिया आलमका इन्तजाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाय तुम्हें ॥
बन्दःसाहब कहीं किया है जुदा । कहीं बन बैठे आप आप खुदा ॥
सारे आलममें तेरी सूतो सदा । तुझसे सारे शरीर शाहो गदा ॥
सिजहा करते हैं खासो आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही वाचून और तुही बेचून । सूरत सब तुझीसे गूनागून ॥
तूही मकबूल औ तूही मलऊन । तूही खुद रम रहा है सारे जून ॥

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