कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 737, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोगी योग कर्मको साथे । किरिया कर्म पवन आराधे ॥
योगी कर्म पवनको किरिया । भुगतै कर्म देहु पुनि धरिया ॥
संन्यासी जो बन बन फिरही । होय निःकर्म कर्म फिर परही ॥
जीयत दग्ध देहको करई । जटा बढाय व्यसन परिहरई ॥
कोई नगन कोई वज्र कछोटा । भरमत फिरै सहे पग ढोटा ॥
राजद्वार पावै औतारा । भुगतै कर्म अकर्म व्यवहारा ॥
पण्डित जन सब कर्म बखानी । नख शिख कर्म फाँस अरुझानी ॥
कर्म धर्मकी युक्ति बतावे । दान पुण्य बहुविधि अरथावे ॥
वज्र दानले जन्म गँवावे । होई ऊँट बहु भार लदावे ॥
एक जो करे बरत अवतारा । होइहै शूकर स्वान सियारा ॥
शूकर श्वान हो कर्म जो भुगता । विन निःकर्म न होईहैं मुकता ॥
साखी-कबीर-बहुबन्धनसे बांधिया, एक विचारा जीव ।
जीव बेचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव ॥
रमैनी-शब्द भेद निःशब्द बताओं । करि निःकर्म हंस मुकताओं ॥
निरालम्ब अवलम्ब न जाने । शब्द निरन्तर भेद बखाने ॥
पाप पुण्यकी छोड़े आशा । कर्म धर्मते रहे उदासा ॥
रहे उदास नाम लौ लाई । तत्त्वभेद निःतत्त्व समाई ॥
तीरथ व्रतके निकट न जाई । भरम भूतको दर्ई बडाई ॥
सुख सम्पति नहिं विपत्तिविचारे । काम क्रोध तृष्णा परचारे ॥
क्रिया कर्म आचार विसारे । होय निःकर्म कर्म निरवारे ॥
सो ग्रहै जो निग्रह काया । अभि अन्तरकी मेटै माया ॥
शील स्वभाव शरीर बसावे । अन्तर स्थिर ध्यान लगावे ॥
ब्रह्म अग्नि मनमें परजाले । ताको विष्णु चरन परछाले ॥
गहै तत्व निःतत्व विचारा । काम क्रोधको करै अहारा ॥
सहज योग सो योगी करई । कर्म योग कबहुँ नहिं परई ॥
धन योवनकी करै न आशा । कामिनि कनकसे रहे उदासा ॥
चहुँ दिशि मंसा पवन ककोले । ज्ञान लहर अभ्यन्तर डोले ॥
उन मुनि रहे भेद नहिं कहई । तत्वभेद निःतत्वहिं लहई ॥
जो कोई आय अग्नि होय दहई । आप नीर होय नीचा बहई ॥
मन गयन्द गुरुमतसे मारा । गुरु गम लूटे ज्ञान मँडारा ॥
भरा होय सो सन्मुख जूझै । भोदू शब्द भेद नहिं बूझै ॥