भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 929

नियमानुसार दो सौ रुपये भोगने लगा । बादशाहने कहा कि, यदि तोता कहे तो विश्वास करूं । बादशाहने पूछा कि, ऐ तोता ! इस मनुष्यको क्या दिया जाय ? तोता बोला कि, इस ठगको एक कूट दे दो । (कूट एक प्रकारका सिक्का है, जो एक अधेलेके बराबर होता है (यह बात सुनकर सारे दरबारी अचम्भमें हुये । बादशाहने हँसकर कहा कि, बहुत अच्छा, यही दिया जायगा ।

तोता नामा — एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है जिसको कि, तोता नामा कहते हैं । तोता नामा फारसी तथा अङ्गरेजीमें भी मैंने देखा था । इसमें बहत्तर कहानियाँ हैं । इस पुस्तकको शुक्बहत्तरी भी कहते हैं । यह पुस्तक पहले संस्कृतमें थी । इसके पीछे फारसी तथा अंगरेजीमें हुई है । एक मनुष्य परदेशमें भ्रमणके लिये गया था । घरपर उसकी युवती स्त्री थी । एक मैना एक तोता रह गया था । तोता तथा मैना दोनों मनुष्योंकी तरह बातें किया करते थे । पुरुषके चले जानेके कुछ दिवसोंके पीछे स्त्रीको काम कामनाने पीड़ित किया । वह एक पुरुषके पास जानेको तैयार हुई । पहले उसने मैनासे पूछा कि, मैं अमुक मनुष्यके पास जाया चाहती हूँ, तू क्या कहती है । इस बात पर मैना ने उसको शिक्षा दी । कड़ी २ बातें कहीं, उस स्त्रीने उसको मार डाला । मैना भर गई, तोता देखता रहा इससे वह इस आपत्तिसे सचेत हो गया । उस दिन तो वह स्त्री ठहर गई, आगे दूसरे दिन अच्छे वस्त्राभूषण पहरे कर चलनेको तैयार हुई । तोतेसे पूछा कि, मैं अमुक पुरुषके निकट जाया चाहती हूँ तू मुझको आज्ञा दे, तोता उस विपत्तिसे सूचित था । उसने कहानी आरम्भ की, ऐसी बुद्धिमानी तथा चातुरीसे समझाने लगा । जिसे कि सुनकर स्त्री हर्षित हुई । अपने घर बैठ रही । दूसरे दिन प्रस्तुत होकर स्त्रीने आज्ञा माँगी तोतेने दूसरी कहानी आरम्भ की जिसको सुनकर वह स्त्री दूसरे दिन भी ठहर गई । इसी प्रकार उस तोतेने बहत्तर दिनों तक बहत्तर कहानियाँ सुनाई बहत्तरवें दिन उसका पति पलट आया । स्त्री व्यभिचारके महापापसे बच रही । वह पुस्तक शुक् बहत्तरी है ।

तोतेनामेके नामसे भी प्रसिद्ध पुस्तक है । पुस्तकोंमें तोता मैनाओंकी ही बातें लिखी हैं ।

बुलबुल ।

उर्दू साहित्यमें प्रेमके अकंटक पुजारियोंकी रसमयी गोष्ठीमें जो स्थान बुलबुलोंको मिला है वह दूसरे किसीको नहीं मिला । जहाँ कहीं प्रेमकी उत्कट प्रशंसाकी जाती है वहाँ बुलबुलको सबसे अगाड़ी रखा जाता है । शृंगारके कवियोंने तो इसके गुण गाये सो गाये ही हैं, पर स्वामी रामतीर्थजी जैसे त्यागी विरक्तों ने