भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जिससे मेरुका गर्व टूट जावेगा। यह विचार कर अपने शृंगोंको यहाँतक बढ़ाया कि, सबेरा होते होते सूर्यके मार्गतक पहुँच गया।

सूर्य निकले तो मार्गको रुका हुआ देखा। रथ ठहर गया, जगतके सब व्यवहार, यज्ञ, हव्य, कव्य आदि बन्द हो गये। नर, दानव, देवता सबके सब अत्यन्त व्याकुल हो सोचने लगे कि, क्या हुआ? क्या करना चाहिये। अन्तमें सब देवता लोग ब्रह्माजीको आगेकर शिवजीके शरणमें जा अत्यन्त नम्रतापूर्वक स्तुतिकर; महेश्वरके प्रसन्न होनेपर बोले कि, विन्ध्याचल मेरुसे द्रैषकर ऊँचा हो गया है, जिससे सूर्यका मार्ग रुक गया है, सब देवता दानव मनुष्य आदि प्राणी महान दुःखी हो रहे हैं। सब प्रकारके यज्ञ आदि बन्द हैं, कालज्ञानके रुक-जानेसे सृष्टि कैसे चल सकेगी, महादेवजी देवताओंकी बात सुनकर भयभीत हो कौपते हुये, इन्द्रको आगेकर शीघ्रतासे विष्णु भगवान्के पास वैकुण्ठ पहुँचे।

वैकुण्ठमें शिव ब्रह्मा सहित सब देवते विष्णु भगवान्की स्तुति करने लगे। नाना प्रकारकी स्तुति करनेपर भगवान् प्रसन्न होकर बोले हे देवताओ! आपकी अभिलाषा पूरी होगी।

देवता बोले कि, हे देव देव! हे विष्णु महाराज! विन्ध्यपर्वत सूर्यका मार्ग रोकता है। सूर्यके प्रकाश बिना जगत्का सब कार्यबन्द है, हम लोगोंको भाग नहीं मिलता क्या करें कहो जायें? विष्णुने कहा कि, हे देवताओ! मुनि-क्षेष्ठ अगस्त्यजी वाराणसी में हैं, आप लोग उन्हींके निकट जावें, वे ही विन्ध्याचल की उद्भूतताको शांत करेंगे। उन्हींसे नम्रतापूर्वक विनयकर आप अभयदान माँगो। विष्णुके इस प्रकार कहने पर सब देवता काशीजीमें अगस्त्यमुनिके आश्रम आये। सबके सब दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति करने लगे महान् कातर हो विनय करने लगे कि, हे स्वामी! आप प्रसन्न होजिये, हम आपकी शरण हुये हैं क्योंकि कान्तिमान दुस्तर विन्ध्यसे हम बहुत दुःखित हुये हैं। देवताओंकी नाना प्रकारकी स्तुति विनयको सुनकर, अगस्त्यजी हँसते हुये बोले कि, हे देवताओ! आप लोग सब लोकपाल महात्मा, त्रिभुवनमें सबसे क्षेष्ठ एवं निग्रह अनुग्रह करनेमें सर्व प्रकार से समर्थ हो, आप लोगोंको कोई भी कार्य कठिन नहीं है तो भी आप को जिस कार्यकी इच्छा हो वह कह डालिये।

मुनिकी ऐसी वाणी सुनकर देवता कहने लगे कि, हे मुनिराज! विन्ध्याचलने सूर्यका मार्ग रोक लिया है, जिससे त्रिलोकी नष्ट होनेको आई है। हे मुनि! अपने तपके बलसे उसकी इस उद्भूतताको शांतकर त्रिलोकीको अभयदान दीजिये, यही हमारा कार्य है।

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