भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 955

उपरोक्त वर्णन गोल्ड स्मिथ साहबकी किताब, एनीमेटेड नेचरके जिल्द (वोलूम) ६० में मैंने देखा है, जिसका जी चाहे देखले ।

सुमेरु और विन्ध्याचलकी लड़ाई ।

देवीभागवतके दशवें स्कन्धके तृतीय अध्यायसे सुमेरु विन्ध्याचल पर्वतकी कथा लिखी है । उसको देवीभागवतसे उद्धृत करके यहाँ लिखता हूँ । देवीभागवत स्कन्ध १०, अध्याय ३ में लिखा है ऋषि बोले कि, हे सूतजी ! यह विन्ध्याचल क्या है ? किस प्रकार आकाश स्पर्श करने लगा था क्यों सूर्य्यका मार्ग रोका था । किस प्रकार अगस्त्यजीने इसे जैसेका तैसा किया, यह विस्तारके साथ कहो । सूतजी बोले कि, सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल पर्वत है यह अत्यन्त शोभायमान है ।

एक समय नारदजी सुमेरु पर्वतसे विचरते हुये विन्ध्याचलके निकट आये । विन्ध्याचलने बड़े सत्कारके साथ उठकर अर्घ्य दे आसन पर बैठाकर पूछा कि, हे ऋषिराज ! इस समय आप कहाँसे आये हो । आपके आनेसे मेरा मन्दिर पवित्र हो गया, आपकी जो मनोवृत्ति हो सो कहिये । इतना सुनकर नारदजीने कहा कि, मैं सुमेरुसे आता हूँ इस सर्वभोगोंके देनेवाले इन्द्र, अग्नि, वरुण यम आदि लोकपालोंके भवन हूँ । इतना कहकर नारदजीने निःश्वास लिया । इसको देख विन्ध्यने पूछा कि, महाराज ! आपके निःश्वास लेनेका क्या कारण है ? नारदजीने उत्तरमें सुमेरुकी सब शिखरोंके सहित अन्य पर्वतोंका वर्णन करते हुये अन्तमें कहा कि, जिसकी विश्वात्मा सहस्र किरण ग्रह नक्षत्रोंके साथ परिक्रमा करते हैं, यह वह सुमेरु पर्वत है । अपनेको पृथ्वीके सर्व पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिनता है । उसके मनमें अभिमान है कि, मैं सर्वमें अग्रणी हूँ, मेरे समान कोई भी नहीं है । हे विन्ध्याचल ! अभिमानियोंके ऐसे अभिमानको देखकर निःश्वास हूँ । महान् तपोबलवालों का भी ऐसा कृत्य नहीं होता जैसा कि, इसका है इतना कहकर नारदजी ब्रह्मलोक चले गये ।

नारदजीके मुखसे सुमेरुकी प्रशंसा सुनकर विन्ध्याचलके मनमें ईर्षाकी अग्नि भड़क उठी । उसको दिनरात इस बातकी चिन्ता रहने लगी कि, क्या करूँ किस प्रकार मेरुको जयकरूँ, जबतक मेरुको जय न करूँ, तबतक मेरी कृति बल, पौरुष, कुल सबको धिक्कार है । इसी चिन्तामें रहकर अन्तमें यह विचार निश्चय किया कि, सूर्य्य नित्य मेरुकी प्रदक्षिणा करते हुये उदय होते हैं, ग्रह नक्षत्र सहित सूर्य्यकी परिक्रमा करनेसेही मेरुको अभिमान होता है । मैं अपने शृंगोंसे सूर्य्यका मार्ग रोक दूंगा, सूर्य्य रुककर मेरुकी परिक्रमा बन्द कर देंगे