भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कमल और कुमोदिनी भी क्रमशः सूर्य चन्द्रमाके ऐसे प्रेमी हैं कि, उनके प्रकाशसे विकसित होते और किरण रूपी किरन मिलनेसे सिकुच जाते हैं। जैसे कोई प्रेमी अपने प्रियको देखकर आनन्द मानता है न देखने से खिन्न होता है उसी प्रकार इन दोनोंकी भी दशा है।

वृक्षके बतक ।

विटन साहिबने नेचरल डिविशनरीमें लिखा है कि, एक प्रकारके बतख होते हैं, जिन्हें अंग्रेजीमें ब्रिड्जलकूस कहा जाता है ये घास आदि चरा करते हैं ये बतकें मेरे मूलकमें सरदीके दिनोंमें आती हैं और गरमीके दिनोंमें उत्तर दिशाकी चली जाती हैं ये एक वृक्षके फल हैं। मलका एलिजेबेथेके शासन कालमें ज़रार्ड साहिब थे वे कहते हैं कि, लंकासायरमें फिल आफफोल्डर्स नामका एक छोटा सा टापू है उस जगह पुराने जहाजोंके टुकड़े एवं वृक्षके गले चूर पाये जाते हैं। वहाँ समुद्रका फेन कड़ा होकर सीपीके समान जम जाता है। रेशमी फीते जैसी कोई वस्तु एक ओरसे सीपीसे लगकर बाकी पानीमें बहती रहती है उसी फीतेसे एक पक्षी उत्पन्न होता है सीपी अपना मुह खोल देती है पहिले रेशमी तार बाहिर निकलता है पीछे पक्षी निकल आता है। पहिले पक्षीके पैर बाहिर निकलते हैं ज्यों २ पक्षी बढ़ता जाता है सीपीका मुंह चौड़ा होता जाता है क्रमशः सारे शरीरके बाहिर आजाने पर भी उसकी चोंच सीपीके भीतर रह जाती है। युवा होनेपर चोंच भी छूट जाती है यह पानीमें गिर पड़ता है पर भी निकल आते हैं इसको लंका सायरके लोग हंकल वृक्षका राजहंस कहते हैं। यह उस दरियामें बहुतायतसे होता है ऐसा सस्ता बिकता है कि, तीन २ पैसे मोल बिका करता है।

कोहड़ा ।

कोहड़ाकी छोटी २ बतियाको जो कोई उंगली दिखाता है तो वह सूख जाता है। रामायण बालकाण्डमें धनुषयज्ञके समय लक्ष्मण जीने परशुरामजीसे दृष्टान्तमें कहा था किः—“यहाँ कोहड़ बतिया कोउ नाहीं। जो तर्जनी देखत गलि जाहीं।”

पहाड़ोंकी लड़ाई ।

डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा है कि, दो पहाड़ दूर २ अपने स्थानपर खड़े थे, ईर्षाके कारण दोनों कुपित हुए। भयंकर गर्जके साथ अपने २ स्थान छोड़कर दौड़े, महान् वेगके साथ लड़ाई करने लगे, अन्तमें जय विजय कर अपने २ स्थानको गये। जितने जीवधारी उस पहाड़ पर रहते थे सभी नष्ट हो गये।