भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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खालिक दर खूनी खड़ा, मार मुंहे मुंह खाय ॥ २८ ॥

कबीर— गला काटि कलमा पढे, किया है कहै हलाल ।

साहब लेखा मांगिहै, तब हो कौन हवाल ॥ २९ ॥

कबीर— गला गुस्सेका काटिये, मियां कहको मार ।

जो पांचोंको बस करे, तो पावे दीदार ॥ ३० ॥

कबीर— यह सब झूठी बन्दगी, बेरिया पांच निमाज ।

सांचे मारे मुंहपर, काजी करै अकाज ॥ ३१ ॥

कबीर— दिनको रोजा धरत हैं, रातको हनत है गाय ।

यह खून वह बन्दगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥ ३२ ॥

कबीर— चाला जाय था, आगे मिले खुदाय ।

मारो तुझसे किन कही, किन फरमाई गाय ॥ ३३ ॥

कबीर— शेख सबूरी बाहिरा, हाँका यमपुर जाय ।

जिनका दिल साबित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥ ३४ ॥

कबीर— तेई पीर हैं, जो जाने पर पीर ।

जो पर पीर न जानहीं, ते काफिर बेपीर ॥ ३५ ॥

कबीर— खूब खाना है खीचड़ी, जामें अमृत लोन ।

मांस पराई खायके, गला कटावे कौन ॥ ३६ ॥

कबीर— कहता हूँ कह जात हूँ, कहा जो मान हमार ।

जिसका गला तु काटि है, सो फिर काटि तुम्हार ॥ ३७ ॥

कबीर— हिन्दूके दाय़ा नहीं, मेहर तुर्कको नाहिं ।

कह कबीर दोनों गये, लख चौरासी मांहि ॥ ३८ ॥

कबीर— मुसलमान मारे करदते, हिन्दू मारे तलवार ।

कहें कबीर दोनों मिले, जैहें यमके द्वार ॥ ३९ ॥

तात्पर्य—कबीर साहब चारों युगसे पुकारते आये हैं कि, हिंसा मत करो, मांस न खाओ, अभक्ष्य पदार्थोंको न खाओ, शराब न पियो, मादक पदार्थोंका सेवन न करो, यह सब महान् पाप हैं, इनका बदला न छूटेगा । महान् कष्टमय अधम अवस्थाकी प्राप्ति ही इनका फल है । इनसे अलग रहनेसेही तुमसे योग्य कर्म हो सकेंगे ।

इस विषयमें कबीर साहबकी बहुत वाणी है, मनुष्य पशु इत्यादि किसी प्रकारके प्राणधारीको दुःख देना, मारना पापके महान् परिणामको प्राप्त कराने-