कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 979, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंखालिक दर खूनी खड़ा, मार मुंहे मुंह खाय ॥ २८ ॥
कबीर— गला काटि कलमा पढे, किया है कहै हलाल ।
साहब लेखा मांगिहै, तब हो कौन हवाल ॥ २९ ॥
कबीर— गला गुस्सेका काटिये, मियां कहको मार ।
जो पांचोंको बस करे, तो पावे दीदार ॥ ३० ॥
कबीर— यह सब झूठी बन्दगी, बेरिया पांच निमाज ।
सांचे मारे मुंहपर, काजी करै अकाज ॥ ३१ ॥
कबीर— दिनको रोजा धरत हैं, रातको हनत है गाय ।
यह खून वह बन्दगी, क्योंकर खुशी खुदाय ॥ ३२ ॥
कबीर— चाला जाय था, आगे मिले खुदाय ।
मारो तुझसे किन कही, किन फरमाई गाय ॥ ३३ ॥
कबीर— शेख सबूरी बाहिरा, हाँका यमपुर जाय ।
जिनका दिल साबित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥ ३४ ॥
कबीर— तेई पीर हैं, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानहीं, ते काफिर बेपीर ॥ ३५ ॥
कबीर— खूब खाना है खीचड़ी, जामें अमृत लोन ।
मांस पराई खायके, गला कटावे कौन ॥ ३६ ॥
कबीर— कहता हूँ कह जात हूँ, कहा जो मान हमार ।
जिसका गला तु काटि है, सो फिर काटि तुम्हार ॥ ३७ ॥
कबीर— हिन्दूके दाय़ा नहीं, मेहर तुर्कको नाहिं ।
कह कबीर दोनों गये, लख चौरासी मांहि ॥ ३८ ॥
कबीर— मुसलमान मारे करदते, हिन्दू मारे तलवार ।
कहें कबीर दोनों मिले, जैहें यमके द्वार ॥ ३९ ॥
तात्पर्य—कबीर साहब चारों युगसे पुकारते आये हैं कि, हिंसा मत करो, मांस न खाओ, अभक्ष्य पदार्थोंको न खाओ, शराब न पियो, मादक पदार्थोंका सेवन न करो, यह सब महान् पाप हैं, इनका बदला न छूटेगा । महान् कष्टमय अधम अवस्थाकी प्राप्ति ही इनका फल है । इनसे अलग रहनेसेही तुमसे योग्य कर्म हो सकेंगे ।
इस विषयमें कबीर साहबकी बहुत वाणी है, मनुष्य पशु इत्यादि किसी प्रकारके प्राणधारीको दुःख देना, मारना पापके महान् परिणामको प्राप्त कराने-