कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 981, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरुष सूक्त—यजुर्वेद पुरुष सूक्त उपनिषद पद्धो, लिखा है सर्व जीवधारी उस विराट् पुरुषके हाड़ चाम और मांस हैं, इस कारण मांस खानेवाले विराट् पुरुषके शत्रु हैं। क्योंकि, वे जीवधारियोंके ही मांसोंको खाते हैं। जो विराट् पुरुषके केशोंको खाते हैं वे उसके शत्रु नहीं हैं, क्योंकि बालोंको तोड़ने काटनेसे किसीको दुःख नहीं होता, किन्तु किसी अशमं सुखही होता है।
सूत्र—मद्यं न पिबेत् मांसं न भक्षयेत् असत्यं न वदेत् परदारान् न स्पृशेत् ॥
अर्थ—मदिरा मत पीओ मांस मत खाओ। झूठ मत बोलो। व्यभिचार न करो।
यज्जीर्वाहिंसायामनुवर्तते तस्य जीवस्य नरकं क्रीडते ॥
अर्थ—जो कोई जीर्वाहिंसाका विचार करता है, वह जरूर नर्कमें जाता है और नाना प्रकारके कष्टोंको प्राप्त होता है।
अहिंसाके विषयमें सर्व वैष्णव लोग और कबीर साहब सहमत हैं। जैन और बौद्धधर्म लोग तो अहिंसाको अपना परमधर्मही समझते हैं पातञ्जलिकी भी यही आज्ञा है। मीमांसा और न्याय भी यही कहता है।
ऊपर जो प्रमाण दिये थे वेद सूत्रादिकोंके थे उनमें परिष्कृत रूपसे जीव हिंसाका निषेध किया गया है, एवं इन कामोंके करनेवालोंको नरककी प्राप्ति बताई है तथा मनुष्यको क्या खाना चाहिये यह भी बता दिया है। अब स्मृतियों तथा ऋषीश्वरोंके वचन दिखाते हैं कि, स्मृतिकारोंने भी इसका निषेध किया है।
ऋषीश्वरोंके वचन ।
ब्रह्मा—ये भक्षयन्ति मांसानि सत्त्वानां जीवितैषिणाम् ।
तैदंयो भक्षितैः सर्वैरिति ब्रह्मात्रवीदृञ्ज ॥
अर्थ—जो जीव जीवनेकी इच्छावाले हैं उनके मांसको जो भक्षण करते हैं वे जीव भी परलोकमें अपने मांसके खानेवालोंके मांसको खाते हैं अर्थात् जो किसीका मांस खावेगा वह दूसरे जन्ममें अवश्य बदला देगा।
अहिंसा परमो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः ।
परम धर्महां अहिंसा है जहां यह अहिंसारूप है वहां अवश्यही जय होती है।
नारद—स्वमांसं परमांसेन यो वद्वयितुभिच्छति ।
नारदः प्राह धर्मात्मा नारकैः सह पच्यते ॥
अर्थ—जो कोई दूसरेके मांसको खाकर अपना मांस बढ़ाया चाहता है वह नरकमें अवश्य पड़ेगा।