कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 999, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभक्ष्यके कारण अपूर्णता—जिस मकानमें गन्दगी, कूड़ा, कर्कट, भरा हुआ हो, लीपा झारा न जाता हो, ऐसे मकानमें दीपका प्रकाश करने पर भी ज्योति बहुत नहीं फैलता पर जो मकान खूब साफ स्वच्छ हो दीवारोंमें उत्तम उत्तम कांच लगे हुये हों ऐसे मकानमें एक छोटीसी बत्ती भी जला दी जाय, तो भी सैकड़ों दीपकोंके समान प्रकाश हो जाता है समस्त मकान ज्योति से भर जाता है । इसी प्रकार मनुष्यका अन्तःकरण है, यही आत्माका मकान है, यदि पापोंसे अन्तःकरण अशुद्ध हो, मांस शराब आदि अभक्ष्य घृणित पदार्थोंसे स्वच्छ हो, भय और शुद्धताके साथ भजनरूपी दीपक प्रकाश किया जावे, तो शीघ्र ही पूर्ण प्रकाशमय हो जावे । यही कारण है कि, पश्चिम देशके महात्मा पीर पैगम्बर, औलिया, नबी आदिकोंने अभक्ष्यका त्याग किये बिनाही बड़ी बड़ी तपस्यायें कीं तिसपर भी भारतवर्षके मामूली ऋषियों महात्माओंके संह्वांश प्रकाशको भी प्राप्त न कर सकें क्योंकि, भारतीय महात्मागण इन्द्रिय स्वादकी वासनाओंको त्यागकर भजन करते थे ।
जिसका जैसा कर्म होता है उसकी वैसेही बुद्धि होती है बुद्धिके अनुसारही विद्याका प्रकाश होता है इसीके अनुसार ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान हुआ व्यक्ति आत्मज्ञानको प्राप्त करता है इसके किये बिना ईश्वरका ज्ञान कठिन ही नहीं बरन असम्भव है । जिसको आत्माका ज्ञान नहीं उसको सत्य ज्ञान नहीं जिसको आत्मा न होता है वह सब जीवोंको अपनी आत्मा समझता है । अखिल जीव धारियोंकी देहको अपना देह समझता है । जो सर्वत्र अपनीही आत्मा समझता है वह किसी जीवधारीको दुःख नहीं दे सकता वह न किसीको दुःख देना ही चाहता है, वो मांस खाना स्वीकार नहीं कर सकता जो कि जीव हिंसाके बिना प्राप्त नहीं हो सकता ।
न्यायकी बात—है कि जितने जीवधारी हैं वे सब अपना बदला लेनेको तैयार होते हैं स्थावर बदला नहीं लेते, जीवधारी पशु और मनुष्य सब एक समान ही हैं आपसमें भाई हैं, जो भाईका रक्तपात करेगा वह अवश्य बदला देगा गला काटनेके बदले गया कटावेगा इसमें कुछ भी अंदेश नहीं है ।
मछली खानेके दोष — जो कोई मांस खाता है वह सब जीवधारियोंका ही तो मांस खाता है उसके लिये शुद्ध अशुद्ध सब एक समान है, पशु और मनुष्यका-मांस एकही सरीखा है । जो मांस आहारी मछली अवश्य खाते हैं वो सब कुछ खाते हैं क्योंकि, मछली सब जीवधारियोंके मांसको खाती हैं विष्ठा आदिकका भी भक्षण करलेती हैं । प्रायः देखा गया है कि बड़ी बड़ी मछलियोंका पेट चौरने पर