भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १० )

अनुरागसागर

अनलपच्छ तेहिलेन न आवैं । उलटचीन्हनिजघरहि सिधावैं । बहु पंछी जग माहिं रहावैं । अनलपच्छ सम नाहिं कहावैं । अनलपच्छजसपच्छिन माहीं । अस विरलेजिव नाम समाहीं । यहि विधि जो जिव चेतैभाई । मेटि काल सतलोक सिधाई ॥

साधु अनलपक्षी समान कब होता है ? छन्द

निरालंब अलंब सतगुरु, एक आसा नामकी ॥ गुरुचरणलीनअधीननिशिदिन, चाहनहिंथनधामकी सुतनारि सकल विसारिविषया, चरणगुरुदृष्टकैगहे ॥

ऐसे साधुको गुरु

सतगुरुकृपादुखदुसहनाशै, धाम अविचलसो लहे ॥

अविचल धामको प्राप्ति किससे होती है ?

सो०-मनवचक्रमगुरुध्यान, गुरुआज्ञानिरखत चले ॥ देहि मुक्ति गुरु दान, नाम विदेह लखायकै ॥ ८ ॥

नाम ध्यान माहात्म्य

जबलग ध्यान विदेह न आवे । तबलगजिवभवभटका खावे ॥ ध्यान विदेह औ नाम विदेहा । दोह खल पावे मिटे संदेहा ॥ छन इक ध्यान विदेह समाई । ताकी महिमा वरणि न जाई ॥ काया नाम सबै गोहरावे । नाम विदेह विरले कोई पावे ॥ जो युग चार रहे कोई कासी । सार शब्द विन यमपुरवासी ॥ नीमषार बंदी परधामा । गया द्वारिका प्राग अस्नाना ॥ अडसठ तीरथ भूपरिकरमा । सार शब्द विन मिटै न भरमा ॥ कहैलग कहीं नाम परभाऊ । जा सुमिरे जमत्रास नसाऊ ॥

नाम पानेवालेको क्या मिलता है

सार नाम सतगुरुसो पावे । नाम डोर रहि लोक सिधावे ॥ धर्मराय ताको सिर नावे । जो हंसा निःतत्त्व समावे ॥