भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १६ )

अनुरागसागर

मान सरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरमपुनितहिया ॥ बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयालु दया उर आयी ॥

पुरुषवचन सहजप्रति

विकस्योपुरुषउठचोजब बानी । बोलत बचन उठचो अथरानी ॥ जाहु सहज तुम धरमकेपासा । अबकसध्यानकीन्ह परकासा ॥ सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥ तीन लोग तब पलमें दीन्हा । लखिसेवकाइ दया अस कीन्हा ॥ तीन लोक कर पायो राजू । भयो अनन्द धरम मन गाजू ॥ अवका चाहें पूछो जाई । जो कुछ कह सो देउ सुनाई ॥

सहजका निरंजनके पास जाना

चले सहज तब सील नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥ कहे सहज सुनु आता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥ अवका मांगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्हा यह तोही ॥

निरंजनवचन सहजप्रति

अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥ इतना ठाव न मोहि सुहाई । अब मोहिबकसि देहहुठकुराई ॥ मोरे चित असभौ अनुरागा । देउ देश मोहि करहु सभागा ॥ कै मोहि देवलोक अधिकारा । कै मोहि देहु देश यक न्यारा ॥

सहजवचन सत्पुरुषप्रति

चले सहज सुन धर्मकी बाता । जाय पुरुषसो कहे विरुषाता ॥ जो कहु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

पुरुषवचन सहजप्रति । छन्द

सुन्यो सहजके वचन, जबही पुरुष वैन उच्चारेऊ ॥ धरमसे सन्तुष्ट हैं हम, वचन मम उर धारेऊ ॥