भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अवुरागसागर

( ४७ )

खनिअण्डज तीन तत्त्व हैं, आप वायु अरु तेजहो॥ अचल खानी एकतत्त्वहि, तत्त्वजलका थेंगहो३३॥ सो०-ऊष्मज तत हैं द्योय, वायु तेज समजानिये॥ पिंडज चारहिं सोयं,पृथ्वी तेहि अपवायुसम ॥३४॥ पिंडज नर परधान, पांच तत्त्वतेज संग है ॥ कहे कबीर परमान, धरमदास लेहुपरखिके ॥३५॥ पिंडज नरकी देह सँवारा । तामें पांच तत्त्व विस्तारा ॥ ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहै नाम सत लोकहिं जाई॥

सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं ? धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनु बन्दी छोरा । इक संशय मेटो प्रभु मेरा ॥ सब नर नारि तत्त्व सम आहीं। इक सम ज्ञान सबनको नाहीं॥ दया शील संतोष क्षमा गुनन । कोई शून्य कोइ होय सम्पूर्णन॥ कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई शीलतलकोई कालउपाधी॥ कोई मारि तन करे अहारा । कोई जीव दया उर धारा ॥ कोई ज्ञान सुनत सुख माने । कोई काल गुणवाद बखाने ॥ नाना गुण किहि कारण होई । साहिब बरणि सुनावो सोई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

धर्मदास परखो चित लाई । नरनारी गुण कहूँ बुझाई ॥ जानते नर है ज्ञानी अज्ञानी । सो सब तोहि कहों सहिदानी॥ नाहर सर्प औ स्वान सियारा । काग गिद्ध सूकर मंजारा ॥ और अनेकजो इन अचखानी । खाहि अखजअधमगुणजानी ॥ इन जो इतने जे जिव आवा । नरकी जोन जन्म जिन पावा॥ पीछे जो इन सुभावन छूटे । कर्म प्रधान महापुन छूटे ॥ ताते सब चले कागके लेखे । नरकी देह परगट तेहि देखे ॥