कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ७७ )
कबीरवचन धर्मदास प्रति
रावण सुनत कोध अतिकीन्ह। जरत हुताशन मनुघृत दीन्ह। ॥ रावण चला शस्त्र लै हाथा। तुरत जाय तिहि काटों माथा॥ मारों ताहि सीस खसि परई। देखों भिक्षुक मोर का करई॥ जहैं मुनींद्र तहैं रावण राई। सत्तर वार अस्त्र कर लाई ॥ लीन्ह मुनींद्र तृण कर ओटा। अति बल रावण मारै चोटा॥
छन्द
तृण ओट यहि कारणे, गर्व धरी राय हो ॥ तेहि कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आयहो ॥
मन्दोदरी वचन
कहे मन्दोदरि सुनहु राजा, गर्व छोड़ो लाज हो ॥ पांव टेकहु पुरुषके गहि, अटल होवै राज हो ॥५५॥
रावण वचन
सो०-सेवाकरों शिवजाय, जिन मोहि राज अटल दियो ताकर टेको पांय पल, दंडवत क्षणिताहिको ॥५८॥
मुनींद्रवचन
सुन अस वचन मुनींद्र पुकारी। तुम हो रावण गर्व अहारी ॥ भेद हमारा तुम नहि जाना। वचन एक तोहि कहों निशाना॥ रामचंद्र मारै तुहि आयी। मांस तुम्हार श्वान नहि खायी॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
रावणको कीन्हो अपमाना। अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना॥
मधुकरकी कथा छन्द
रावणको अपमान करी, तब अवधनगरहि आयऊ॥ विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरशतिनमन पायऊ ॥
१ इसके बदले पुराने ग्रन्थोंमें ऐसा लिखा है—
“तीन जीव परमोघि लंका, तब अवध नगरहि आयऊ”