भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २८ )

ज्ञानसागर

सुनतहिं बलि अब धरे उपाऊ । अर्घ पाबडे कीन्ह बनाऊ ॥ नमस्कार कर पूछी बाता । आज्ञा कहा सुनौ तुम दाता ॥ माँगौं सो मोहि दीजै राऊ । दानी सुन आएऊ तोहि ठाऊ ॥ मोहि देव माँगौं जो स्वामी । महा पंडित तुम अन्तर्यामी ॥

छन्द

परनकुटी छावन चहैं महि देव तुम बलिराई हो । पग तीन माँगौं नापतै जायैं होय अटाव हो ॥ सुनि विहँसे बलिराय तबही अहो विप्र माँगौं कहा । हीरा रत्न मानिक पदार्थ छांड महिमें क्या रहा ॥ सोरठा-माँगौं थोरा दान, यही रुचि मोहि सुन नृपति । प्रथम वचन परमान, तृष्णा स्वारथ निधि कहौ ॥

चोपाई

शुक्र मंत्रि सुन शीश डुलावा । हे नृप दान मोहि नहिं भावा ॥ राजा सुनत कोथ तब कीन्हा । बृद्धि बोल मन्त्री मतिहीना ॥ लीन्हा नृपति हाथ कुशपानी । कीन्ह संकल्प मही दियो दानी ॥ मानहु विप्र वचन परवाना । लेव तहां जहँवौं मन माना ॥ तीनौं पुर तीनौं पग कीन्हा । प्रगटे हरि तब सबहिन चीन्हा ॥ देव पूरा नृप आधा पाऊँ । नातर जाय पुण्य परभाऊ ॥ लेव नापि प्रभु पीठ हमारी । तातैं विष्णु वाक्य मैं हारी ॥

छन्द

नाप दीन्ही पीठ अपनी बलि नृपति बड़ राइ हो । वाचा व्रत में बांधि राख्यो लक्षमता पैठाय हो ॥ विश्वास दीन्हा मुक्ति कौ भरमाई राख्यो तेहि हो । यही भांति प्रपंच कीन्ह्यो तपी सिद्ध सबहि हो ॥ सोरठा-बूझो सन्त मुजान, हरि दीन्हा जस मुक्ति फल । पछतइहो अन्त निदान, एक नाम जाने विना ॥