भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( २९ )

सनक सनंदन चरित्र

चौपाई

सनक सनंदन चले हरषाई । पुर वैकुंठ सुमेर पर जाई ॥ जय रु विजय दोह रहैं प्रतिहारा । रोकि न तेहि न दीन पैठारा ॥ सुनिकै क्रोध ऋषि तब कीन्हा । जय रु विजय कहैं शाप जो दीन्हा ॥ हाऊ दैत्य तुम दोनों भाई । जाई रहो मृत्यु मंडल ठाई ॥ सुनिकै शाप दोनों गये जहँवा । हरि बैठे लक्ष्मी संग तहँवा ॥ कहिन जाइ तिहि ऋषिकर भाऊ । सुनकर विष्णु कीन्ह पछताऊ ॥ थोरी चूक शाप बड़ दीन्हा । नहिं भल कीन्ह अवज्ञा कीन्हा ॥ ऋषिन बुलाय कही अस बाता । है परभाव वैर कर घाता ॥

साखी—जय रु विजय कहैं शापेऊ, होहु दैत्य प्रभाव । ताको सुत तुम होहु अब, शाप का बदलौ पाव ॥

चौपाई

अब स्वामी तुम वचन प्रमाना । मो कहैं देव भक्ति भगवाना ॥ जय अरु विजय काल वश भयऊ । तिन कौ जन्म मनुष्यहि ठएऊ ॥ हिरनाकुश वा हिरनाक्ष राऊ । कीन्हा सेवा बहु शम्भू ठाऊ ॥ पा वरदान भये बलवन्ता । नहिं कोई देव यक्ष गुणवता ॥ सोई आन पुनि कीन्ह संग्रामा । भाजे देव छांड़ि सब धामा ॥

साखी—तब प्रपंच हरि कीन्हा, अस ठाना व्यवहार ॥ ताकी नार औधान रहि, भयो पुत्र अवतार ॥

चौपाई

हिरनाकुश जब भये हरषता । चले असुर घर जन्मो पूता ॥ सेवकन दीन्हैं रतन पदारथ । शिव सुत दीन्ह जन्म ममस्वारथ ॥ बर्ष पांच को भयो जो बारा । गुरु बुलाय पढ़ने बैठारा ॥ शिवकी भक्ति तुम याहि पढ़ावहु । माँगहु इच्छा सो फल पावहु ॥ लै घर विप्र गये तब बारा । पढ़ौ सुसुत शिव भक्ति विचारा ॥ प्रहलाद शिवको भक्ति जो धरहुं । हरषे नृप मम विथा बिसरहुं ॥