कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३० )
ज्ञानसागर
साखी-केतौ गुरु प्रबोधै, शिव न पद्वै प्रहलाद । विष्णु विष्णु गुरहार्वई, सुन गुरु करै विपाद ॥
चोपाई
एक बार नृप सभा मझारी । बैठे सुत कहैं कीन्ह गुहारी ॥ गये प्रतिहार ले आए बारा । गुरु समीप पढ़ने बैठारा ॥ हर्षत चूम्यो सुत को शीसा । सकलसभादियो बहुत अशीसा ॥ सुत मोहि कछु पाठ सुनावहु । कहौ वचन मम हृदय जुड़ावहु ॥ तब प्रहलाद पढ़न अनुसारा । धन्य विष्णु जिन काय सम्भारा ॥ पानी तैं जिन पिण्ड बनावा । तिहि प्रभुको कोइ अन्त न पावा ॥ अलख निरंजन देव सुरारी । सुनौ तात मैं तुव बलिहारी ॥ सुनत वचन हिरनाकुश राऊ । कोध कीन्ह जस अग्नि स्वभाऊ ॥
साखी-अहो मंद जड़ अकरमी, किमि ठानो मम बार ॥ जाइ 'पढ़ावहु' शंकर, नातर झोंको भार ॥
चोपाई
दिन दशमें पढ़ाइ लै आवहु । शिव कि भक्ति भली भांति सिखावहु ॥ नृप आज्ञा पढ़वे को दीन्हा । तब प्रहलाद पढ़े अस लीन्हा ॥ हरि तज काहि पढ़ौ मैं ताता । चार पदारथ के फलदाता ॥ भक्ति पक्ष सन्तन सुखदाई । जिन प्रभु सकल सृष्टि उपजाई ॥ तब नृप सुन अस वचन उचारा । मारहु सुत यह शत्रु हमारा ॥ हस्ति बुलाए अति बलवन्ता । चलत छांहि भुव देह पदंता ॥ ता कहैं आज्ञा दीन्ह भुवारा । देव महाबल आंकुश भारा ॥ साखी-हस्ति देख प्रहलाद कह, चले पराइ पराय ॥ नरसिंह रूप दिखराय हरि, भक्ति करत मन लाय ॥
चोपाई
तब नृप ऐसी युक्ति विचारी । जरत अग्नि देव सुत कहैं डारी ॥ अग्नि जरत तब पवन उड़ानी । प्रहलाद पढ़ै तब सारंग पानी ॥