कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवेकसागर
(१०१)
सुमती कहे सुनु पुंगव मतिके आगरा ॥ समर वृद्धिके कीजे जगत उजागरा ॥ प्रथमहीं दूत पठाय नीति बहु विधि कहो ॥ नहि माने सतभाय तबहि आयुध गहो ॥
टीका—विवेक राजाके पूछनेपर सुमतिने कहा कि, हे राजन् ! आप बुद्धिमान हो विग्रह करनेमें जहाँतक हो विचार कर कार्य करना चाहिये । प्रथम दूत भेजकर मोहको बहुत प्रकारसे नीति द्वारा समझाइये यदि वह मान जाय तब तो ठीक ही है और नहीं तो फिर पीछे हथियार उठाकर युद्ध करना चाहिये ॥
शील दूत कहैं बोली शिशुवापन दीनेऊ ॥ चलयो तुरत शिर नाय विदा जब कीनेऊ ॥
टीका—हे धर्मदास ! जब सुमतिने इस प्रकारसे कहकर नीति का मार्ग बताया तब विवेक राजाने शीलको बुलाकर कहा कि, हे शील ! आप दूत बनकर मोहराजाके पास जाओ । और जो कुछ मोह राजासे कहना था वह सब अच्छी प्रकार शीलको सिखाकर विदा किया । फिर तो शीलविवेकके पाससे चल कर मोह राजाके दरबारमें पहुँचा ॥
मोह आदि भ्राता जे सबहि सुनायऊ ॥ बन्धु विमात संदेश सो सबहि बुझायऊ ॥
टीका—शील दूतने मोह राजाकी सभामें जहाँ सब भाइयों सहित मोह राजा बैठा था पहुँच उसके सौतेले भाई विवेकका संदेश सुनाया ॥
कारण कौन विरोधेऊ बोलहु नागरा ॥ बन्धव सम होय कीजे राज उजागरा ॥