कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंविवेकसागर
(१०७)
में विवेक प्रगट होता । इस कारण विवेकका मूल शुद्ध अन्तःकरण है जिस समय मनुष्यको काम उत्पन्न होता है उस समय अन्तःकरण मलिन वासना और देहाभिमानसे पूर्ण हो जाता है तब शुद्धान्तःकरणका अभाव होकर मलिन अन्तःकरणका प्रादुर्भाव होता है ) ॥
मूल गही उधार डारूँ मोसन करत सरभरै ॥
विचार सुनि बोलत विवेकहि संपुट युगकरधरै ॥
टीका—काम कहता है रे विवेक तू क्या मेरी बराबरी करना चाहता है ? मैं तेरे मूलको ही उखाड़ कर फेंक दूँगा । कामके ऐसे अहंकार युत वचनको सुनकर विचारने राजा विवेकसे हाथ जोड़कर विनय किया कि—
सुनु सुमतिनायक परमलायक दास कौतुक देखिये ॥ काम क्रोध अभिमानिया नट चेटका सम लेखिये ॥
टीका—हे सुमतिके मालिक परम योग्य विवेकराजा ! इन काम क्रोध और अभिमानादिकोंको नाटकी चेटकियोंके समान जानिये । इनका बलही क्या ? सुझा दासके कौतुकको देखिये । इस प्रकार विनय करके और विवेककी आज्ञा लेकर विचार रणमें कामके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥
एक दिशि गर्जत काम विचार तब उभय दिशा ॥ काम करत बल जब अंत तब तरजत रसा ॥
टीका—हे धर्मदास ! अब एक ओर तो महा दुर्धर्ष काम गरजने लगा और दूसरी ओर विचार अपना प्रकाश फैलाने लगा । अब दोनोंका युद्ध होना आरम्भ हुआ । कामने जब अपना पौरुष कहके सुनाया, तब विचारने उसको तुच्छ बताया विचारके मुखसे तिरस्कारके वचन सुनकर काम कहने लगा ॥