भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(१०८)

विवेकसागर

रे विचार मतिहीन सकल वशि मैं कियो ॥

ब्रह्मा विष्णु महेश सबहि ताजन दियो ॥

टीका-काम कहता है रे मतिहीन विचार ! तेरी क्या विसात है, मैंने सब चराचरको अपने वशमें कर लिया है । औरकी कौन कहै ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सबको मैंने ताजन दिया है, (मारा है) । इतनेही नहीं मेरे बलका प्रताप तू और सुनले ।

सुरपति शसि द्वि राते गौतम त्रिय कही ॥

विवेक विचार जो थाके बासा मैं गही ॥

टीका-रे विचार ! सुन जिस समय मैंने इंद्र और चन्द्रमा को वशमें किया, तब उनकी बुद्धि नष्ट होगयी, विवेक विचार सब जाता रहा और मेरी आज्ञासेही परम पवित्र गौतम मुनिकी पतिव्रता स्त्रीको भ्रष्ट किया । उस समयभी मैंने तुम दोनों (विवेक और विचार) को पराजय किया था । इतनी ही नहीं और भी सुन ।

व्यास पिता मीन दुहिता रतिबर बस कियो ॥

सुमन शरासन बाण शिवहि बेध्यो हियो ॥

टीका-रे विचार व्यासके पिता परमज्ञान और विवेक विचार में प्रसिद्ध जो पराशर ऋषि थे उन्हींको जब मैंने अपना बाण मारा तब वहाँ भी तुम्हारा कोई बश नहीं चला, उन्हींने मछली के पेट से निकली मत्स्यगन्धा (मच्छोदरी) से नदी के बीचमें भोग किया । और जब मैंने अपने बाणका लक्ष्य शिवजी को बनाया तब उन्होंने कामातुर होकर मोहिनी को पकड़ने की इच्छा की ।

दोहा-कहि कहाय मनसिज हस्यो, बोल्यो वचन उदार ॥

मो सम्मुख जलपै कहा, मेरो बल अपार ॥

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