कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविवेकसागर
( १०९ )
मो रति अति दुस्तरण लखि, जीतैं मोहिं जग कोन ॥ ज्ञान विवेकै आहिदे, लखत मोहिं करि गौन ॥ पग नहिं टिकत सुधर्मको, नहिं धीरज ठहराय ॥ मेरी दृष्टि परतही, वैरागो नशि जाय ॥ मैं मन हरचो विरञ्चि को, निज पुत्री वश कीन ॥ शतंमख द्विजंजाया निरखी, भयो परम अर्धान ॥ है कोतो बल अंग तुव, अरे सुभट कहु मोहि ॥ मेटों मार विलम्ब नहिं, प्रलय करत हौं तोहि ॥ पछितान्यो कांप्यो हृदय, शोचत वस्तु विचार ॥ हौं निर्बल वैराग बिन, अहै सबल अतिमार ॥ वस्तु विचार फिरे तबै, महा समर भय मान ॥ तुरते राय विवेक पहैं, बन्धन कीन्है आन ॥ मन संकोचि दृग नीच करि, कहत वचन नृपपास ॥ मेरो बल पहुँचे नहीं, निष्फल भयी सब आस ॥ तब मन्त्री सत्संग कर, औ दूजी अभ्यास ॥ उत्तम मन्त्र विचार के, कहत नृपति के पास ॥ मकरध्वज भुज बल अमित, बाक वीर समरत्थ ॥ वस्तु विचार महाबली, करे ताहि निजहत्थ ॥ दीजै ताहि सहायको, भक्ति ज्ञान वैराग ॥ विजय करे रण सहजही, वस्तु विचार बडभाग ॥ सुनि विवेक मन सुख भयो, मान्यो मन्त्र हिय जु ॥ तीनों तुरत बुलाइके, ताके संग किय जु ॥ बल पायो फूलो हृदय, चले समर समुहाय ॥ मनसा भूमि सुहावनी, रचे युद्ध तहैं जाय ॥
१ इन्द्र । २ गौतमकी स्त्री । ३ कामदेव ।