कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११० )
विवेकसागर
ठाढो सहित सहाय तब, मदन वीर बलवान ॥ दृष्टि परचो वैराग जब, कछुक दृष्टि सकुचान ॥ वस्तु विचार बोल्यो तबै, महाबली रण गाज ॥ सो हैं करत विवेककी, कित जै हैं रिपु भाज ॥ महाकोप करि बोल्यो, तबहीं सबल अनंग ॥ मो सन्मुख एतो बकै. करौ क्षणकमें भंग ॥ कुसुम धनुष वर हाथले, करों बाण सन्धान ॥ सकल अंग पलमें हैं, मेरो बल अप्रमान ॥ छूटे शर जो समर के, भयो युद्ध भयभीत ॥ गावत युगल समाज तहैं, रणरसमत्त जु गीत ॥ तब विचार वैरागसो, बूझत मन्त्र विचार ॥ अहौ बन्धु कीजे कहा. बडो सकल यह मार ॥ तब वैराग विचार के, दीन्हो मतो अन्त ॥ अहो बन्धु शोचत कहा, शोधो शुद्ध स्वरूप ॥ जग मिथ्या रजु सर्पवत, सत्य ब्रह्म निरधार ॥ छुद्र निंद्य नहिं चित धरो, हरो अनंग विकार ॥ जब वैराग महा बली, दीन्हो मतो अभंग ॥ वस्तु विचार चल्यो तबै, धरि उर परम उमंग ॥ रे निलज्ज पापी कुटिल, दुर्बुद्धी धृक तोह ॥ कहा वस्तु विचार ने, दुष्ट पिसन जन मोह ॥ कहो मार अतिदर्प करि, मैं मन मोहो भूप ॥ शंकरको मन मोहेऊँ, धरचो मोहिनी रूप ॥ मैं पराशर दहन कियो, रावणको घर खोय ॥ श्रुद्धी ऋषि वनमें छल्यो, परे त्रिशो वश सोय ॥ जीत्यो एक कटाक्षमें विद्यामित्र सुधीर ॥
१ विश्वामित्रजी मैनकाको देखकर कामातुर हुए थे जिससे शकुंतला का जन्म हुआ ।