कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( ३१ )
तब नृप ऐसी युक्ति अरंभ । बांधो सुत कई गाड़ो खंभा ॥ जो कोइ होय तोर रखवारा । ता कई सुमिरो सुत हो वाग ॥ नातर छांडु विष्णु कर नाऊँ । अबही घात करो यहि ठाऊँ ॥ तब प्रहलाद सुभिरै भगवाना । कहा तू करब दैत्य बलवाना ॥ अहो धरणिधर अहो सुरारी । यहि औसर प्रभु लागु गुहारी ॥
साखी-खंभा सौं हरि नीकसे, की भयंकर गात ॥
आधा नर आधा सिंह का, कीन्ह दैत्य ही घात ॥
दोऊ बंधु महा बलि मारा । दैत्य मारि महि भार उतारा ॥ फारचो उदर नखन सौं छीना । सुर औ नरन हरष बहु कीना ॥ मांग प्रहलाद इच्छा फल आजू । तोहि भक्तलगहनौ दैत्यहि राजू ॥ कर जोरे प्रहलाद अस भाखा । हे स्वामी भक्तन प्रण राखा ॥ मोक्ष पिता कई दीजे स्वामी । मोहि भक्ति सुन अन्तर्यामी ॥ साधु साधु विष्णु अस भाखा । पुत्र पिता प्रण भल तुम राखा ॥ दोई जन्म आगे औतारब । तब तोर पिता देख मैं तारब ॥ तैं मम भक्ति कीन्ह बडि सेवा । ताकर फल भाषौ कछु भेवा ॥ दैत्य हते जब बाल कन्हई । आवै देव सबै तेहि ठाई ॥ करहि सुयस हरि सबहि बखाना । प्रहलादहि देवस्वर्ग अस्थाना ॥
साखी-कीन्ह इन्द्र प्रहलाद कई, सब मिलि कीन्ह विचार ॥
नरसिंहरूप नर कीन्हा, ताको यह व्यवहार ॥
नारद चरित्र
चौपाई
एक समय इन्द्र यज्ञ ठानी । निवते सिद्धि ऋषि औ ज्ञानी ॥ पहुँचे गन गंधर्व सब झारी । सब मिलि कीन्ह ज्ञान सुधारी ॥ जो कोई गया इन्द्र अस्थाना । इच्छा भोजन सब कई ठाना ॥