कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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विवेकसागर
टीका-विवेक राजाने मंत्रियोंसे विचार करके क्रोधके सन्मुख क्षमाको संग्रामके लिये भेजा । अब दोनों ओरकी सेनाके बीचमें एक ओरसे महा विकाल क्रोध और दूसरी ओरसे महाकोमलांगी परमशान्त क्षमाका युद्ध आरंभ हुआ ॥
दोहा-नृप विवेकविस्मित भयो, सुनतहि क्रोध प्रभाव ॥ बृह्यो मंत्रिनसे यहै, कांजे कौन उपाय ॥ दियो मन्त्र सत्संग वर, धीरज अचल सवीर ॥ क्षमा नारि मन भावती, पुत्र आर्य्यव धीर ॥ धीरज रु क्षमा पठायो, ज्ञान भक्ति ता संग ॥ तेज क्रोधको सहजही, क्षमा करे तन भंग ॥ धीरज क्षमा विदा कियो, पुत्र आर्य्यव जान ॥ दीन्है सकल सहायको, विमल भक्ति अरु ज्ञान ॥ धीरज धरि धीरज चलयो, गयो आप रणभूमि ॥ जहाँ क्रोध गर्जत रह्यो, नयन मद झूमि ॥ मिलि दृष्टिसे दृष्टि जब, भयो क्रोध रिस अंग ॥ गरज्यो सन्मुख जायके, मारि करौं बल भंग ॥
क्षमाको सन्मुख लड़नेके लिये आया देखकर क्रोध गरज कर कहने लगा ।
क्रोध कहै सुनु भीता मोहिं न जानसी ॥ कम्पित है त्रिलोक मरण निज ठानसी ॥
टीका-क्रोधने कहा हे डरपोक क्षमा ! क्या तू मुझे नहीं जानती है कि, मेरे भयसे तीनों लोक कम्पायमान हो रहे हैं ऐसा जानकरके भी तू मरनेके लिये सामने क्यों आयी है ॥
क्रोध सँधारैउ छित्तिपति राज जित कित कियो ॥ क्रोधविश सुरलोक दैतन जहरहि दियो ॥