भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥ त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥ एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥ एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥ एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥ कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥ ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥ एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥ त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥ योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥ परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥ मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥ योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥ करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥ राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥ झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥ झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥ झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।