भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥ लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥ यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥ बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥ आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥ ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥ ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥ जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥ कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥ इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥ रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥ जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥ जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥ जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥ बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥ परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥ ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥ चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥ गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥ तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥ साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥ झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥ तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥ जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥