भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥ करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥ कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥ सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥ सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥ ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥ आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥ ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥ लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥ रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥ काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥ धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥ व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥ ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥ सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥ धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥ चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥ जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥ ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥ जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥ रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥ यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥ साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥ रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥