भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 529

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥ परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥ निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥ अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥ तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥ नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥ देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥ उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥ कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥ सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥ राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥ डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥ भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥ हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥ साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥ जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥ सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥