भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 528

(८४)

अमरसिंह बोध

यहिविधिजोयम शासतिकरई । कहैं लगि कहौं पार नहिं परई ॥ सुनत हाल व्याकुल धर्मदासु । सुख प्रस्वेद नहिं आवै श्वासु ॥ देखि दशा सदगुरु बोले । केहि कारण धर्मनि तुम डोले ॥ धरि धीरज तब धर्मनि भाषा । नरककथासुनिभयमन भाखा ॥

धर्मदास वचन

हो साहेब यम बड विकरारा । केहि विधि हंसा पावे पारा ॥ यही भय मम मन महाँ आवै । चितवत चितव्याकुलहोयजावै

सतगुरु वचन

सुनत वचन प्रभु मन विहँसाये । कही शब्द धर्मनि समुझाये ॥ धर्मनि तुमही भय कलु नाही । सतगुरु शब्द है तुमरे पाही ॥ अपर कथा सुनहु चितधारी । संशय मिटै तो होहु सुखारी ॥ जब राजा विनती ममकीन्हा । तब हम ताहि दिलासा दीन्हा ॥ शब्द गहै सो नाहि डराई । तुम किमिडरहु सुनहु हो राई ॥ सत्य शब्द मम जे जिव पैहैं । काल फांस सो सबै नशैंहैं ॥ सुनत वचन राजा धरु धीरा । बोले वचन काल बलबीरा ॥

चित्रगुप्त वचन

है साहब तुम काह विचारो । नगर हमार उजारन धारो ॥ हो साहब जो तुम अस करहु । न्याय नीति सबही तुम हरहु ॥ सुनो साहेब एक बात हमारी । पंथ तुम्हारा चले संसारी ॥ ताते बिनती करैं बहोरी । सुनो गुसाइयाँ अरनो मोरी ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव अधिकारी । तीनकी आशजगतमहैं भारी ॥ उनको हम नहिं कबहु डरावैं । चूक चाल तो ताहि नचावैं ॥ और जीवकी कौन चलावे । हमते उबरन एको न पावे ॥ सीधि चाल चलुजीव सुजाना । सो जीव देहों लीक पयाना ॥ परंपंच करी साहेबको धावे । हम ते जीव जान नहिं पावे ॥ चाल चलत लागै बडिबारा । ताते नाहीं दोष हमारा ॥