कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥ तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥ रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥ करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥ ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥ एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥ जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥ तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥ तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥ जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥ पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥ तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥ देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥ बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥ दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥ पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥ लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥ जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥ जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥ तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥ मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥ जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥ तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥ लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥ इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥
१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।