कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(११)
जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥ अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥ सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥ पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥ भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥ काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥ मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥ नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥ पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥ षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥ एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥ पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥ काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥ एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥
सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥
सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥
कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥
सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥
चौपाई
पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥
हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥
पुरुष वचन
अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥