भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

( ४६ )

ज्ञानसागर

चौपाई

मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥ रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥ चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥ मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥ मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥ रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥ चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥ पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥

साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥

हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥

चौपाई

मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥ मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥ उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥ पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥ जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥ तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥ नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥

साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥

जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥

चौपाई

कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥ सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥ दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥