कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
जगजीवनबोध
छठी पडोसिन
यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥ जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥ कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥
ओझा और स्याने
बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥ सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥ देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥ गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥ यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥
पुरोहित
घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥ यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥ पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥
चारण और भाट
चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥ सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥
मुसलमान फकीर
दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥ बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥
योगी
जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥ कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥
दिगम्बर
यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥ व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥