भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ३१ )

प्रगट काम काया के भीतर । सोच फिकिर नहिं व्यापे अंतर॥ अन्ध करै बहुत अहंकारा । निरखै तिरिया घर घर द्वारा॥ परवश दूती आनि मिलावै । जोर करै तो पकरि मगावै ॥ नाहकको तू कान लगावै । नहिं मानै तो यमघर जावै ॥ अघ करमी होय तन डोलै । जोर बहुत गरभ सो बोलै ॥ आंखिन माहीं वर्षे लोई । ज्ञान ध्यानकी सुधि ना होई ॥ गुरु चरचाके निकट न जावै । हँसी मसखरीसों मन भावै ॥ झूठी बात करै लबराई । तासों हेतु करै मितराई ॥

साखी—यह नर गरभ भुलाइया, देखि मायाको झोल । कहै कबीर सब चेतहु, सुमिरि पाछलो कौल ॥

चौपाई

इन्द्री स्नेह न मानै चेता । माया गर्ब फिरै मैमंता ॥ ईगुण प्रगटा अन्तर माहीं । कामातुर होय करी विवाही ॥ पहले विवाही एक लुगाई । बहुत प्रेम सँग ताहि लिवाई ॥ विषय विवेक फिर उपजा भारी । पीछे व्याही सुन्दरि नारी ॥ अँगारस्वरूप कामिनि अधिकार्ई । कामातुरसों रहे लपटाई ॥ महा अनन्द भये मन माहीं । एक पलक सँग छाड़े नाहीं ॥ करै खवासी कहत है दासी । बन्धा मोह जाल की फांसी ॥ खिदमतगार सहेली घनी । कई नायिका कई रामजनी ॥ नव नव खण्डके महल बनाये । सेना केरे कलस चढाये ॥ करी बिछावन तहैं बडभारी । गादी तकिया बहुत अपारी ॥ बहुत मोलको अतर मँगावै । फूलन केरी सेज बिछावै ॥ कहैं लगि बरनूं यह विस्तारा । मायाविनको बार न पारा ॥ टपका स्वाद भया तर अन्धा । आवै यम तब करै बहु फंदा ॥ नित नित त्रिया नई संयोगा । खान पान और षट रस भोगा ॥