भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 702, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 702

( १२२ )

हनुमानबोध

हंस गति पाये नहिं कोई । मोर सँदेश माने नहिं सोई ॥ ताते गये विगोइ विगोई । नहिं माने दुख पायो सोई ॥ सत्य शब्द मैं कहौं बखाना । बूझ होय तो बूझो ज्ञाना ॥ सारखी-बूझ करो हनुमत तुम, हौ तुम हंस स्वरूप । राम राम कह करत हौ, परै तिमिर के कूप ॥ राम राम तुम कहत हौ, नहिं सो अकथ सरूप । वह तो आये जगतमें, भये दशरथ घर भूप ॥ अगम अथाह तुमसों कहौं, सुनि लो अगम विचार । उत्पति परलय तहैं नहीं, साहब सिरजन हार ॥

चौपाई

सुनो हनुमत यह कथा नियारी । तब नहिं हती सो आदि कुमारी ॥ जाते भयी सकल विस्तारी । सो नहिं होती रचने हारी ॥ आदि भवानी सो महमाया । ताकी रचना हती न काया ॥ नहीं निरञ्जन की उत्पति कीन्हा । समरथ का घर काहु न चीन्हा ॥ तब नहिं ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । अगम ठौर समरथ को देशा ॥ तब नहिं चन्द्र सूर्य औ तारा । तब नहिं अंध कूप उजियारा ॥ तब नहिं सात सुमेरु औ पानी । समरथ की गति काहु न जानी ॥ तब नहिं धरणि पवन आकाशा । तब नहिं सात समुद्र प्रकाशा ॥ पांच तत्त्व तीन गुण नाहीं । नाहीं तहाँ और कछु माहीं ॥ दश दिगपाल लखै नहिं लेखा । गम्य अगम्य काहु नहिं देखा ॥ दशों दिशा इन रचना रंची । वेद पुराण गीता इन बांची ॥ मूल डाल वृक्ष नहिं छाया । उत्पति परलय हती नहिं माया ॥ तब समरथ हते आपु अकेला । धरम माया नहिं मनको मेला ॥ विन सतगुरु को ठौर लखावे । भूली राह कौन समुझावे ॥ सारखी-हनुमत यह सब बूझिकै, करो आपनो काज । निर्भय पद को पाइके, होय अभय सो राज ॥