भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १३१ )

रंकार गरज ब्रह्मण्डा । सप्त द्वीप परगटे नौखण्डा ॥ समरथ अंश बसे अस्थीरा । अस्थिर वस्तु वसैं घर धीरा ॥ ताको कोई चीन्हे नाहीं । ताते सब जग मरि मरि जाहीं ॥

साखी-कायाके गुण अगम हैं, सुनु तुम हनुमत वीर । नहिं काहुको लखि परै, अटपट रचा शरीर ॥

हनुमान बचन-चौपाई

अहोस्वामी मैं सब विधिजानी । तुमही समरथ तुमही ज्ञानी ॥ कहा अस्तुति तुम्हारी कीजै । अमृत बचन सुनी हम भीजै ॥ सब संदेह मिटायो मोरा । जनमजनमकामिटचोझकझोरा ॥ सुखसागर अमर घर चीन्हा । भलेसतगुरु मोहि दर्शन दीन्हा ॥

साखी-दर्शन देइ सुनीन्द्र तुम, मोको किया सनाथ ॥

भी सागरसे लै चले, केश पकड़ि गहि हाथ ॥

हनुमान आधीन है, लीन्हो सहज को पान ॥

जब सुनीन्द्र शिष्य किये, दे समरथको ज्ञान ॥ ❁

खण्ड ब्रह्माण्ड पारके पारा । तहाँ समरथको घर तत सारा ॥ निर्भय घर है तहाँ सो भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥ ताका तुम जो सुनो विचारा । समरथ का घर है सबके पारा ॥ सबके पार रहे निरधारा । पिंड ब्रह्माण्ड ताके आधार ॥ सो समरथ है सबसों न्यारी । सुनु हनुमत तुम लेहु विचारी ॥

• पुरानी प्रतियोंमें यह पुस्तक इसी साखी तक समाप्त हो गई है किन्तु १९१३ सम्बत्वाली प्रतिमें और भी अधिक है सो इस साखी के आगे से आरम्भ होकर अन्ततक है ।

इतना हो नहीं बहुत पुरानी प्रतियोंमें आदिमें “सेतुबन्ध में जायके, वेखा हनुमतवीर” से ही पुस्तक आरम्भ भी होती है किन्तु उस साखीके ऊपर की चौपाई नवीन प्रतियोंमें पाई जाती है, और उससे कोई किसी प्रकारका बिगाड़ नहीं होता इस कारण उसे लिख दिया है ।