भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 929, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 929

बोधसागर

( ६१ )

धर्मदास वचन

साखी-कर्म भर्म भव भा सब, दिये भारमें झोंक । सतगुरुके परताप सों मिट गये सबही धोंक ॥

सदगुरु वचन

साखी-यह भव तारण ग्रन्थ है, सतगुरु का उपदेश । जो मन माने प्रीति कर, पहुँचे हमरे देश ॥

चौपाई

गुप्त भेद सुनहु धर्मदासा । आपहि आप भये परकासा ॥ मूल वस्तु बीज है भाई । उपजे विनशै आवै जाई ॥ निह अक्षर ते अक्षर भाया । अक्षर आदि अमी उपजाया ॥ आदिअमी किये सकल पसारा । फल रहा कछु नाहिं न न्यारा ॥ सोहं कला अमीके माहीं । श्वेत बीज झलके तेहि ठाहीं ॥ श्वेत बीजका मूल है माया । तासों बची सकलकी काया ॥ श्वेत बीजका सकल पसारा । तामें जीव लिया अवतारा ॥ तब अंकूर अमी ते भयऊ । पारस अंस फैल सब गयऊ ॥

साखी-उत्पति परलय बीज गति, बीजहि आवे जाय । गुप्त प्रगट जो कुछहती, सो सब दिया लखाय ॥ निह अक्षर अक्षर भया, अक्षर किया प्रकाश । मनते माया ऊपजे, मायात्रिगुणहि रूप ॥ पांच तत्त्वके मेलमें, बांधे सकल स्वरूप । माया ब्रह्म जी तत्व अरु, रज सत तम त्रिय देव ॥ इन सब ही को छोड़कर, करनिह अक्षर सेव ॥