भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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प्रस्तावना ।

संग रहकर, गुरु रूपसे प्रकट हो, उपदेश देता रहता है। तथापि विशेष रूपसे सम्भवत १४५६ वि० के जेठ पूर्णिमा को काशीमें प्रकट होकर सत्यका डंका बजा, जीवोंको चेताना आरम्भ किया और अपने उपदेश और कथनको विशेष रूपसे, निज श्रद्धालुओंके हृदयमें दृढीभूत करानेके हेतु, अन्तिम लीला करनेके लिये, सम्भवत १५७५ में मगहरको गमन किया था ।

उस समय समस्त भारतवर्षमें आपकाही डंका बज रहाथा, इस हेतु आपके काशी छोडतेही वर्तमान कालके समान रेल तार और डाक आदिका प्रबन्ध न रहते हुए भी, आपके मगहर जानेका समाचार समस्त भारतवर्षमें तत्कालही फैल गया और देश देशान्तरोंसे संत महात्मा सिद्ध साधुओंके झुन्डके झुंड मगहरमें इकट्ठे होने लगे और वहां बहुत बड़ा भारी मेला लग गया । यद्यपि बिजलीखां नवाब, राजा बीरसिंह बघेल आदि बड़े बड़े राजा महाराजा तथा बड़े बड़े धनाढ्य साहुकार लोग, जो आपके श्रद्धालु सेवक थे, वे संत महंतोंकी सेवामें सब प्रकारसे तत्पर थे तथापि, मगहरमें पानीका इतना अभाव था कि, बहुत उपाय करनेपरभी पानीकी कमीसे सबको बड़ा कष्ट होने लगा । उस समय नवाब बिजलीखां आदिकी प्रार्थनापर सदगुरु कवीरकी दया दृष्टिसे आभी नदी प्रकट हुई, जिससे सबका कष्ट निवारन हुआ और अबतक होता है ।

उसी समय लेखक के पुरुषा श्री दक्ष नाम साहबभी, जो गोरखपुरमें रहकर परमार्थ प्राप्तिके लिये, योगका साधन कर रहे थे, मगहर गये और सदगुरु कवीरके दर्शन और उपदेशसे कृतार्थ हो आपको गुरु धारणकर लिया । तबहींसे बराबर आजतक, कवीर पंथकाही धारण, लेखकके वंशमें चला आता है । उसी सिलसिले में, गोरखपुरके घासी कटरे, देवरिया, नव तन, मलहपुरवा, हातामठिया, भरवट-टोला, आदि स्थान इस समयभी वर्तमान है । इसीसे पाठक समझ सकते हैं कि, कवीर साहबके सिद्धान्त और वाणी वचन, वंश परम्परासे सीनें पसीनें चले आनेके कारण, कितना, और किस रूपमें लेखकसे सम्बद्ध है । इतना होनेपर भी, लेखकके पुरुषाओंने कोई विशेष पंथ नहीं चलाया, न विशेष अपना कोई अलग वेध बनाया । इसका कारण यही है कि, पंथ चलानेका अधिकार तो केवल धर्मदासजीको ही है । धर्मदासजीके समानही जो सदगुरुके वचनमें पूर्ण श्रद्धा रखकर कमाई करे वह वचन वंश कहला सकता है किन्तु पंथके अधिकारी तो धर्मदासजी ही हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, आज भारतमें क्या संसार भरमें कवीरके नामसे जितने वचन वाणी प्रचलित हैं सबका सम्बन्ध धर्मदासजीसे जरूर है । सबसे पहले धर्मदासजीनेही सदगुरुकी वाणीको संग्रहकर उसकी व्याख्या आरम्भ की और उसी