भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

( ६ )

प्रस्तावना ।

संग रहकर, गुरु रूपसे प्रकट हो, उपदेश देता रहता है। तथापि विशेष रूपसे सम्भवत १४५६ वि० के जेठ पूर्णिमा को काशीमें प्रकट होकर सत्यका डंका बजा, जीवोंको चेताना आरम्भ किया और अपने उपदेश और कथनको विशेष रूपसे, निज श्रद्धालुओंके हृदयमें दृढीभूत करानेके हेतु, अन्तिम लीला करनेके लिये, सम्भवत १५७५ में मगहरको गमन किया था ।

उस समय समस्त भारतवर्षमें आपकाही डंका बज रहाथा, इस हेतु आपके काशी छोडतेही वर्तमान कालके समान रेल तार और डाक आदिका प्रबन्ध न रहते हुए भी, आपके मगहर जानेका समाचार समस्त भारतवर्षमें तत्कालही फैल गया और देश देशान्तरोंसे संत महात्मा सिद्ध साधुओंके झुन्डके झुंड मगहरमें इकट्ठे होने लगे और वहां बहुत बड़ा भारी मेला लग गया । यद्यपि बिजलीखां नवाब, राजा बीरसिंह बघेल आदि बड़े बड़े राजा महाराजा तथा बड़े बड़े धनाढ्य साहुकार लोग, जो आपके श्रद्धालु सेवक थे, वे संत महंतोंकी सेवामें सब प्रकारसे तत्पर थे तथापि, मगहरमें पानीका इतना अभाव था कि, बहुत उपाय करनेपरभी पानीकी कमीसे सबको बड़ा कष्ट होने लगा । उस समय नवाब बिजलीखां आदिकी प्रार्थनापर सदगुरु कवीरकी दया दृष्टिसे आभी नदी प्रकट हुई, जिससे सबका कष्ट निवारन हुआ और अबतक होता है ।

उसी समय लेखक के पुरुषा श्री दक्ष नाम साहबभी, जो गोरखपुरमें रहकर परमार्थ प्राप्तिके लिये, योगका साधन कर रहे थे, मगहर गये और सदगुरु कवीरके दर्शन और उपदेशसे कृतार्थ हो आपको गुरु धारणकर लिया । तबहींसे बराबर आजतक, कवीर पंथकाही धारण, लेखकके वंशमें चला आता है । उसी सिलसिले में, गोरखपुरके घासी कटरे, देवरिया, नव तन, मलहपुरवा, हातामठिया, भरवट-टोला, आदि स्थान इस समयभी वर्तमान है । इसीसे पाठक समझ सकते हैं कि, कवीर साहबके सिद्धान्त और वाणी वचन, वंश परम्परासे सीनें पसीनें चले आनेके कारण, कितना, और किस रूपमें लेखकसे सम्बद्ध है । इतना होनेपर भी, लेखकके पुरुषाओंने कोई विशेष पंथ नहीं चलाया, न विशेष अपना कोई अलग वेध बनाया । इसका कारण यही है कि, पंथ चलानेका अधिकार तो केवल धर्मदासजीको ही है । धर्मदासजीके समानही जो सदगुरुके वचनमें पूर्ण श्रद्धा रखकर कमाई करे वह वचन वंश कहला सकता है किन्तु पंथके अधिकारी तो धर्मदासजी ही हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, आज भारतमें क्या संसार भरमें कवीरके नामसे जितने वचन वाणी प्रचलित हैं सबका सम्बन्ध धर्मदासजीसे जरूर है । सबसे पहले धर्मदासजीनेही सदगुरुकी वाणीको संग्रहकर उसकी व्याख्या आरम्भ की और उसी

प्रस्तावना ।

(७)

क्रममें सैकड़ों ग्रन्थोंकी रचना हो गयी । आपकी आत्मिक शक्ति और गुरु भक्ति तथा गुरु वचनमें दृढ़ताका ही प्रताप है कि, आजतक भी प्रायः जो वाणी वचन बनते हैं सबमें कवीरके साथ धर्मदासजीका नाम किसी न किसी रूपमें अवश्य आता है ।

धर्मदासजीके लिखे भविष्य कथन भी, चाहे वह किसीके लिये क्यों न हो, ऐसा अटल है कि, तिल प्रमाण भी फरक नहीं पड़ता । और तो और आपने अपने बंशोंके विषयमें भी कवीर मुखसे जितनी भविष्य वाणी लिखी है, वह भी अक्षर अक्षर सत्य उत्तरा है और आगे भी सत्य उतरेगा । इसके प्रमाणके लिये ग्रन्थ “आगम संदेश” कवीराश्रम खरसिया से मंगाकर देखना चाहिये ।

एक तो मेरे पुरुषा स्वतः कवीर साहबके शिष्य हुए थे, दूसरे वह पंथ पंथा-इयोंके झगडेसे अलग रहकर सदा सत्यका आश्रय करके, आत्म तत्वके विचारमें मग्न रहा करते थे । इसका परिणाम यह हुआ कि, सहस्रोंग्रंथोंका संग्रह हो गया जो, मेरे पिता श्री १०८ गोस्वामी वख्शी गोपाललालजीके पुस्तकालयसे मुझे प्राप्त हुआ ।

इसके अतिरिक्त सम्बत् १९४६ में जब मेरी आयु केवल १६ वर्षकी थी तवहीं में वंशप्रतापी बेलवतियाके महंत श्री १०८ श्रीमान गोस्वामी श्याम बिहारी दासजी साहबकीशरणमें प्राप्त हुआ, तबसे और भी सहायता मिली और छीत्तीस-गढसे विशेष सम्बन्ध जुटा । फिर तो थोडेही दिनोंके पश्चात् श्री १०८ पंश्रीउग्रनाम साहबका दर्शन रेगनिया स्थानमें हुआ ।

उसके थोडे दिनोंके पश्चातही मुझे सदगुरुके आदेशसे, सदगुरुके समान पिताश्रीकी आज्ञा लेकर, देश भ्रमणको निकलना पड़ा । जिसका संक्षेप वृत्तांत “सत्य कवीर की साखी” की प्रस्तावना में दिया है, जिसको देखना हो श्री बैंकटेश्वर प्रेस बम्बई” से मंगाकर देख सकता है ।

देश भ्रमणसे लौटने पर सबसे प्रथम वाणियों के प्रकाशनका कार्य मैंने सम्बत् १९५३ में लेखनऊसे आरम्भ किया था—उस समय मूलरमैनीकवीरसंग्रह, (१०८ अंगकी साखी) आदि प्रकाशित करके जो निवेदन निकाला था सो यह है ।

निवेदन जो सबसे पहले ग्रन्थ प्रकाशनके पश्चात् निकाला ।

॥ सत्गुरु कवीरसाहबकी दया ॥

बारों तन मन धन सबै, पद परखावन हार ।

युग अनन्त जो पवित्र, बिनगुरु नहि निस्तार ॥

(८)

प्रस्तावना ।

महाशय !

जबसे कलियुग ने अपना राज्य पाया, तब से भारत वर्ष से सत्य धर्म और विचार विद्याका लोप होने लगा और अनेक प्रकारके हिंसा और दम्भ युक्त स्वार्थ साधक मत फैलने लगे, जिससे सत्यपुरुष, सच्चिदानन्द सदगुरुकी सेवाको छोड़, बहुतसे हिंसक देवताओंकी कल्पना कर, उनके बहानेसे नित्य प्रति करोड़ों जीवोंकी हिंसा होने लगी, जिससे लोगोंकी बुद्धि तमोगुणी हो, सत्य धर्मके समझनेमें असमर्थ हो गयीं ॥ वेद शास्त्रका पढ़ना विचारना जाता रहा, सत्यमार्गका लोप होने लगा और उसकी यहाँ तक बूढ़ी हुई कि, भारत वर्षके लाखों आदमी अपने पवित्र सनातनधर्मको छोड़ (अपने धर्मके प्रभावको न जाननेके कारण) परमधर्म को स्वीकार करने लगे ॥

परन्तु इस प्रवाहको रोकनेवाला, बादशाह सिकन्दर लोदीके पहिले तक, कोई खड़ा नहीं हुआ सिकन्दरके समयमें सदगुरु सत्यकवीर साहेब प्रकट हुए और इतने प्रसिद्ध हुये कि, भारत वर्षका एक बच्चा भी आज कल उनके नामको जानता और उनके पदोंको गाय गायकर आनन्द प्राप्त करता है बड़े बूढ़ोंका तो कहनाही क्या है । उन्होंने उस समय उन नानाप्रकारके, पाखण्ड हिंसा युक्त धर्मोंमें पड़े जीवोंको, सत्य विचार हीन हो दुःख भोगते देख, कर्णुणकर सर्वके हितका शोच किया ।

संसारी पारख बिना कैसे पावें ठौर ।

विविध युक्ति अनमिल सबे भोगर्वाहि और के और ॥

और सत्यका उपदेश देना आरम्भ कर दिया ।

और सरल देश भाषामें वेद शास्त्रोंके सिद्धांत तथा लोक परलोकमें सुख देनेवाले अनेक ग्रन्थ तथा सहस्रशः शब्द पर भजन आदिकी रचनाकर लोगोंको सत्य मार्ग सुझाया और पाखण्डको दूर किया ।

जिसका फल यह हुआ कि, सहस्रों मनुष्योंने फिर अपने पवित्र धर्मकी तरफ लौट कर पर धर्मको छोड़ अपने हिन्दू धर्मको ग्रहण किया ।

जिसका सबूत यद्यपि उपस्थित है कि, सहस्रशः मुसलमान कवीर पंथी, जिनका व्यवहार वर्तमान है, चाल-चलन, आचार-विचार सब हिन्दू के समान और अहिंसक, मद्यमांस त्यागी तो ऐसे हैं कि, मद्य मांसाहारियोंके साथ भोजन तक नहीं करते ।

और इसी प्रभावके ऊपरसे कवीरपंथकी भी स्थापना हुई और तबसे सन्तों ने बहुतसे ग्रंथ आदि रचना किया, जिससे हिन्दू धर्मका बहुत बड़ा उपकार हुआ ।

प्रस्तावना ।

(९)

इन सब उपकार तथा दयाको न विचार, आज कल बहुतसे महाशयोंने, विना तहकीक किये विना शोचे अनेक कपोल कल्पित बातें गढ़ंत कर, उन ग्रन्थों तथा वचनोंका निरादर तथा निन्दा करना आरम्भ कर दिया है ।

परन्तु ये लोग ऐसा क्यों करते हैं ? इसका कारण क्या है ? क्या वे जान कर निन्दा करते हैं ? इन प्रश्नोंके उत्तरको यदि हम विचार कर देखें तो केवल यही उत्तर देंगे कि, नहीं वे जानकर निन्दा नहीं करते, परन्तु सुनी सुनाई बातों के ऊपर आक्षेप करते हैं, जिनमें प्रायः बही बातें होती हैं । कि, जो कोई २ बुद्धिहीन असारप्राही पक्षपाती अपने स्वभावानुसार एक दूसरेकी निन्दामें कहा करते हैं । और इसी तरह से सब धर्मों के विषय में कहा जा सकता है । और उन्होंने सुनी सुनाई बातोंके ऊपर न जाकरके सच्चे दिल से पक्ष छोड़ विचार किया है, वे कभी निन्दा का नाम नहीं लेते जैसा नाभा जी अपने भक्तमाल में लिखते हैं ॥

छप्पय ।

भक्ति बिमुख धर्म सब अधर्म करि गायो ।

योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ बतायो ॥

हिन्दू तुरुक परमाण रमैनी शब्दे साखी ।

पक्षपात नहीं करी सबनके हितकी भाखी ॥

आरुढ दशा होय जगतमें मुख देखी नाहि न भनी ।

कबीर कानि राखी नहीं बर्ण आश्रम षट दशनी ॥

अब इसका विचार करना कि, क्या कारण है कि, आज कलके लोग कबीर साहेब के आशयको न समझ कर, निन्दा पर कमर बांधके खड़े होते हैं ? इसका कारण सिवाय इसके कि, उन्होंने ग्रन्थ तथा सद्गुरु कबीर साहेबकी वाणी का विचार नहीं किया है, दूसरा कुछ नहीं हो सकता ॥

परन्तु मैं उनका भी इसमें दोष नहीं देता क्योंकि, आज कल प्रेस होजानेसे लोगोंको छपा पुस्तकें कि, जो थोड़ेही परिश्रममें प्राप्त होती हैं देखनेको स्वभाव पड गया है, किन्तु आजतक कबीर साहेबके ग्रन्थ छपे नहीं हैं जिससे सर्व साधारण उन्हें देख, उनके आशयको समझ मिथ्या पक्षको छोड़ निन्दा विरक्त होंवें ॥

इस हेतु, ग्रन्थके मिलनेके अभावको दूर करनेके लिये, मैंने अत्यंत परिश्रम से ग्रन्थोंको इकट्ठा किया है और छपवानेको भी आरम्भ कर दिया है, जिनमेंसे कई एक पुस्तकें छपकर तैयार हो गई हैं और सब छापी जाएही हैं और क्रमशः छपती रहेंगी ॥

अब सर्व महशयोंसे केवल इतना कहना चाहता हूं कि, यदि आप सच्चे

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प्रस्तावना ।

धर्मके खोजी हैं, अपने सरल देश भाषामें तत्त्व ज्ञान(Philosophy) जानना चाहते हैं, हिन्दी भाषाके प्रेमी हैं, सर्व साधारणकी सरलदेशभाषा—(ठेठ हिन्दी) में हृदय बेधक भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, नीति, आदिके शब्दोंको चाहते हैं तो, जैसे और पुस्तकों में बहुत कुछ खर्च करते है, वैसे इस में भी थोड़ा लगाकर इसे भी देखिये ॥

और दो पैसे के कार्ड द्वारा अपने पता ठिकाने नाम जिला प्रांत के नाम (स्पष्ट साफ, हिन्दी, उर्दू, अंगरेजी, गुजराती, किसी अक्षरोंमें) नीचे लिखे पतेसे भेज दीजिये कि, जिसके द्वारा जब जब पुस्तक छपे तब तब उसका विज्ञापन (इशतहार, जाहिरखबर समाचार) आपके पास रवाना किया करूं ।

यदि आप सत्यगुरु कवीर साहेबके मतानुयायी हैं तो विशेष कहनेकी क्या आवश्यकता ? आप स्वयमही समझ लीजियेगा, सब धर्मवाले अपने २ गीत गारहे हैं और एक पक्ष तथा सोसाइटीको लेकर रिफारमर बनते हैं परन्तु, यह तो आपका पक्षरहित निर्पक्ष भावसे सर्वके उपकारार्थ कार्य है । उठिये, जागिये और उन्नति कीजिये, आप सुधरिये, और दुखी जीवोंको जो पाखण्डमें फंसे दुख पारहे हैं, सत्य-पथ लखाइये, पारख प्राप्त कराइये, अपने सच्चे दयालपदकी इस परोपकार द्वारा रक्षा कीजिये, अधिक क्या कहूँ । पुस्तकोंका सूचीपत्रभी साथ लगा है, उसमें लिखे पतेसे पुस्तक मंगाइये ।

इसके पश्चात सम्बत १९५७ में जब कि, मैं अहमदाबादमें साबरमतीके किनारे, भीमनाथ पर, श्रीसंतदासजी साहबकी सहायतासे, सत्यपंथका प्रचार कर रहा था, उस समय कबीरमन्शूरके हिन्दी भाषामें छपनेका समाचार पहुँचा, किसी श्रद्धालुके द्वारा एक फार्म भी देखनेको मिला । जिसे देखकर और मूल उर्दू ग्रन्थसे अनेक अंशोंमें विपरीत जानकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ, तब फार्म लाने वालोंसे मैंने अपना विचार प्रकटकर मनो वेदना बाहर की । जिसका समाचार हिन्दी कबीरमन्शूरके आदि प्रकाशक श्रद्धालु कबीरपंथी मकनजी कुबेर पेंटर तथा उसके छापनेवाले श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिक परम वैष्णव महानसज्जन धर्म धुरन्धर श्रीसेठ खेमराज जी को भी मिली । इन लोगोंने मुझे अहमदाबाद से बुलानेका आयोजन किया, किन्तु, उस समय विशेष नियम पालन करते हुए, विशेष अवस्थामें रहनेके कारण, मैं शीघ्र बम्बई नहीं आसका, इसलिये कबीर मन्शूर छपनेका काम कुछ दिनतक बन्द रहा । पश्चात् मेरे नियम अनुष्ठानका समय पूरा हुआ और मैं बम्बई आकर घाटकोपर पर ठहरा । तब श्रीयुत मकनजी कुबेर पेंटर और श्रीयुत सेठ खेमराजजी क्रमशः मुझसे मिले तथा अनुरोधकर मुझे

प्रस्तावना ।

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बम्बई ले आये और कबीरमन्शूरकी छपाई आगे चली । जो कुछ पीछे छप चुका था, वह एक ऐसे सज्जनद्वारा अनुवाद कराया गया था जिसको धर्मकी गन्धर्भी नहीं लगी थी । इसलिये आवश्यकता तो इस बात की थी कि, सब फिरसे शुद्ध करके दुबारा छपाया जाय, किन्तु, इसमें सेठजीको बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती थी, इस कारण मकनजीको समझा बुझाकर विशेष २ फार्म जिनमें बहुतही अशुद्धियाँ थीं छपवाकर शेष वैसेही रखना पड़ा । जो आजतक वैसेही हैं इस भेदको न जाननेवाले कतिपय महात्माओंने, मेरे ऊपर कटाक्षकर पत्रोंमें लेख भी छपवाये हैं किन्तु, मैंने उन्हें अनजान जानकर उत्तर तक नहीं दिया है । अब मैंने फिरसे कबीरमन्शूरको हाथमें लिया है और मूलसे बराबर मिलाकर, टीका टिप्पणी और प्रमाणोंसहित तैय्यार किया है, सद्गुरुकी कृपा होगी तो थोड़े दिनोंमें प्रकाशित भी हो जायगा ।

कबीरमन्शूरके पश्चातही “कबीरोपासनापद्धति” मकनजी कुबेर पेन्टरके अनुरोधसे लिखना पड़ा था । उस समय श्री १०८ पंथी उग्रनाम साहबकी सेवामें कुदरमाल जानेकी जल्दी थी, क्योंकि इन्दौर कबीरमन्दिरके भूत पूर्व आचार्य सद्गुरु श्रीमहंत शम्भु दासजी साहबने वहां चलनेकी सूचना दीथी और भुसावलमें मिलनेकी बात निश्चित होगयी थी । इस लिये कबीरोपासनाके छापनेमें इतनी जल्दी की गयी कि, केवल आठ दिनोंमेंही ग्रन्थकी लिखाई छपाई सब होगयी और मैं कुदरमालको रवाना हो गया । पंथी उग्रनाम साहबका दर्शन तो दश बारह वर्ष पश्चात् रँगनिया मठपर हो चुका था किन्तु महंत श्री शम्भु दासजी साहबका दर्शन सबसे पहले कुदरमालमेंही हुआ । फिर तो पंथीकी आज्ञा और श्रीयुत महंत साहबकी सम्मतिसे, इस अनुचर द्वारा १५६० के कबीरपंथी संतसमागमका आयोजन हुआ । कबीरपंथमें यह समागम ऐसा था जो न भूतो न भविष्यति ।

कुदरमालकी महा संतसमागमसे लौटकर श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ हुआ । जिसके परिणाम स्वरूप श्रीवेंकटेश्वर प्रेसकी सूचीमें, कबीरपंथी ग्रन्थोंका विभागही अलग हुआ । इतनेही नहीं कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन और उठाव देखकर बनारस, पटना, दर्भङ्गा, इलाहाबाद, कानपुर, नरसिंधपुर, लाहौर, स्यालकोट, अहमदाबाद, भावनगर, बडोदा, सूरत-आदि स्थानोंसेभी कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ होगया, जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों कबीरपंथी ग्रन्थ आज बुकसेलरोंकी दूकानोंमें हाथोहाथ विकते देखे जाते हैं ।

उस समय पहले पहले जब ग्रन्थ प्रकाशित होने लगे, कबीरपंथी समाजमें

१२

प्रस्तावना ।

बड़ा भारी आन्दोलन मच गया, साधारण कवीरपंथी तो ग्रन्थोंको पाकर आनन्द मग्न होने लगे और स्वार्थी जो ग्रन्थोंको सेवक सतियोंको दिखाना भी पाप सम्भ्रान्त थे, बड़े घबराये, मुझपर उनको इतना क्रोध हुआ कि, मुझे पहले तो अदालत तक घसीटा और वहाँ जब कुछ वश नहीं चला तब, पंथी उग्रनाम साहबको सम्झना बुझाकर, मुझे ग्रन्थोंके छपानेसे रोकनेके हेतु, दामाखेड़ा बुलवा लिया, और देखा वे के लिये प्रेस भी लिया गया और प्रथम मेरे देख रेखमें रखा गया । जब मैंने ग्रन्थों के छपानेकी बात चलाई तब बड़े बड़े प्रपंचों द्वारा ग्रन्थ छपायी की बात तो क्या प्रेससेही सम्बन्ध छोड़ना पड़ा। यद्यपि प्रेसमें ग्रन्थ छपानेकेही लोभसे मैंने अपनी गांठके भी बहुत रुपये प्रेसमें लगादिया था तथापि महान अन्त्यायसे सब गबन कर लिया गया । बदलेमें दीवान हंस दास द्वारा मेरी झूठी निन्दा और बदनामी का खूब प्रचार किया गया । दीवान हंस दासकी कारवाई पूर्वके संत महंतोंमें तो चली नहीं, क्योंकि, उन्हें दामाखेड़ेवालोंका सब हाल मालूम था किन्तु, गुजरातके कतिपय, लोगोंने उनकी बातोंको सत्यमानकर द्वेषका बीज अपने अन्तः करणोंमें बोलिया जिसका अंश आजतकभी दृष्टिगोचर होता है ! अस्तु यह भी एक कालकी वाजीही थी नहीं तो साठ वासठ हजारकी लागतका प्रेस पंथी दयानाथ साहब द्वारा, कुछ मूर्खोंके कहनेसे, नौ सौमें एक विधर्मीको क्यों दे दिया जाता ?

अस्तु काल भगवानकी कृपासे ग्रंथ और वाणी वचनके प्रकाशनमें सद विघ्न होता चला आता है और सद्गुरु दयालकी दयासे मैं यथा शक्ति प्रयत्नमें लगाही हूँ । कई वर्षोंके अथक परिश्रमसे, इस वर्ष कवीरपंथी शब्दावलीका यह ग्रन्थ छपने पाया है । कवीरमन्थूरमें भी हाथ लग गया है किन्तु, काल निरंजनकी दृष्टि उसकी ओर भी पड़ी है, अनेक विघ्न आकर उपस्थित हैं देखें क्या परिणाम होता है ?

यद्यपि मेरे पास इस समय चालीस हजारसे भी ऐसी वाणीका संग्रह है जिसमें “कहें कबीर” की छाप लगी है । इच्छा तो ऐसी होती है कि सबही छपकर प्रकाशित हो जाय किन्तु, सद्गुरुने मुझे केवल ग्रन्थ और वाणियोंके संग्रहकी योग्यता दी है जिनके पास साधन है, वह इस ओर ध्यान नहीं देते, मेरे पास साधन नहीं है तबभी बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षा लिये बैठे हैं । यद्यपि इच्छानुसार कार्य्य नहीं होता तथापि लगे रहनेसे कुछ न कुछ तो होताही है । जिन कबीरपंथियोंके पास धन है उन्हें इसका संस्कारही नहीं, नहीं तो उन्हें यदि धनही जमा करना है तो उपस्थित धनकी वृद्धिका, यह ग्रन्थोंका प्रकाशन कितना अच्छा मार्ग है । कुछ ग्रन्थोंको छपाकरही लोगोंने लाखों रुपये कमाये हैं यदि कोई कबीरपंथी इसी

ग्रस्तावना ।

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कामको करता तो ये रुपये उसीके घर तो जाते । किन्तु काल भगवानके जाल, संसारी मान पान राग भोगसे उन्हें फुरसत ही कब है कि, इस ओर ध्यान देने । काल निरञ्जनने कबीर साहबसे कहाही था कि, ।

बिनतौ एक करौं तुहि ताता । दिठ करि मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हार जीव नहिं भनि हैं । हमरी ओर होय बादबखनिहैं ॥ दिठ बन्धन में रचा बनाई । जामें जीव रहै उरझाई ॥ जो ज्ञानी जैहो संसार । जीव न माने बचन तुम्हारा ॥ पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सतलोक पठाऊ ॥ द्वादश पंथ करौं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करौं अवाजा ॥ द्वादश जन्म संसार पठैहों । नाम तुम्हार ले पंथ चलैहों ॥ यहि बिधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥

मुझे तो, ऐसे नाममात्रके कबीरपंथी, जो काल और मायामें फँस कर, केवल सांसारिक स्वार्थके लिये मर रहे हैं, उनसे वे लोग अच्छे जान पड़ते हैं जो कबीर पंथी न कहलाने पर भी चाहे व्यापारिक लाभ की ही कामना से क्यों न हो कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन करके, कबीर धर्मका प्रचार कर रहे हैं। मैं तो विशेष रूपसे श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिकोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने दर्जनों ग्रन्थ प्रकाशित कर, तीस वर्षोंसे लाखों प्रति कबीरपन्थियों तक पहुँचाया है ।

इस ग्रन्थके छापनेके लिये यद्यपि मुझे तीन वर्षतक प्रतीक्षापूर्वक बम्बई सेवन करना पड़ा है, तथापि ज्यों त्यों करके इतना भी छप गया है । आशा तो थी कि, कबीरमन्शूर, कबीरभानुप्रकाश, कबीरकौमुदी, तालीम कबीर कलियुग आदि सहित, संग्रहित चालीसहजार शब्दोंको छपवा देता और श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके स्वामी खुशीसे छापते जिससे उनको व्यापारिक लाभ था किन्तु वर्तमान काल और वस्तु स्थितिको देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता ।

कुछ भी हो मैंने आरम्भसेही अपना जीवन इसी कार्यके लिये अर्पण कर दिया है तब “जब तक जीना तबतक सीना” वाली कहावतके अनुसार, प्रयत्नसे न रुकूँगा और एक जगह नहीं दूसरी नहीं तीसरी जहाँ होगा जमीन आस्मान एक करके ग्रन्थोंको, जहांतक हो सकेगा, छपवा करही छोड़ूँगा क्योंकि इस समय

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प्रस्तावना ।

सद्गुरुकी कृपासे कबीरपंथी ग्रंथ छपानेको बडे २ प्रेसवाले तय्यार हैं किन्तु मेरी इच्छा है कि, जबतक श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें मेरे ग्रंथ छपचुके तबतक दूसरेको न दूँ और अंत तक यही कार्य करते हुए संसार लीलाको समाप्त करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। इसी उद्देश्यसे “कबीरधर्मदर्शनग्रन्थमाला” छपवानेका आयोजन किया है। यह ग्रन्थ उसी ग्रन्थमालाका दूसरा भाग—समझना चाहिये। प्रथम भागमें नौ मणिक और इसमें शेष मणिका रखा है। जिसमें सुमेरस्थानी मूलरमैनी जानना चाहिये, जो पृष्ठ ४८७ से ५०२ तक है। आगे आगे जैसे और और ग्रन्थ छपते जाएँगे सूचना बाहर पडती जायगी।

अब मैं उन महानुभावोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिनसे मुझे मेरे इस काममें विशेष सहायता ग्रन्थोंद्वारा मिली है।

  1. (१) सद्गुरु श्री. १०८ सत्यलोकवासी महन्त श्री शम्भुदासजी साहबके संशोधित और टिप्पणीवाले शब्द आदि वर्तमान महन्त श्री. लक्ष्मण-दासजी द्वारा प्राप्त हुए हैं, इतनेही नहीं आपने सद्गुरुसाहबके कुल ग्रन्थोंके छपवानेका अधिकार भी मुझे देकर सर्व साधारण तथा मेरा बहुत उपकार किया है इसलिये आपको कोटिशः धन्यवाद है।
  2. (२) श्री १०८ महंत श्री तुरंतदासजी साहबने हस्तलिखित ग्रन्थोंद्वारा सहायताकी है इसलिये आप भी विशेष धन्यवादके पात्र है।
  3. (३) श्री १०८ महंत श्री सुखलालदासजी साहब खारी बावली-दिल्ली।
  4. (४) श्रीयुत महंत मंगलदासजी साहब मु० हैदर कुली दिल्ली।
  5. (५) श्री महंत गुरुसरनदासजी गोंदौरा जि० फतेहपुर।
  6. (६) श्री महंत अमर दासजी साहब जोधपुर।
  7. (७) श्रीयुत राम रूपदासजी साहब रोसडा।
  8. (८) श्रीयुत परमहंस मित्तुदासजी साहब रोसडा।
  9. (९) श्री महंत चंचलदासजी साहब मौजी।
  10. (१०) श्रीमहंत सुन्दरदासजी साहब मुदारघाट।
  11. (११) श्रीयुत पण्डित वसंत दासजी साहब विथान गढी।

प्रस्तावना

१५

(१२) श्रीमहन्त विशुनदासजी साहब नलाबाजार अजमेर । इत्यादि अनेक संत महंतोंने मेरे इस कार्यमें ग्रन्थ और वाणी आदि भेजकर सहायताकी है, सबको अत्यन्त नम्रता पूर्वक बन्दगी सहित धन्यवाद ।

इस संग्रहमें क्या क्या संग्रहित है उसका संक्षेपमें तो सूचीपत्रसे पता लग जायगा और विस्तार ग्रन्थ देखनेसे पता लगेगा । ग्रन्थ बहुत बढ़ जानेसे बड़ा सूची-पत्र नहीं छप सका तथापि इतना तो यहाँ आवश्यक कहना होगा कि, इस ग्रंथ में लगभग सात हजारसे भी अधिक वाणियोंका संग्रह है ।

इस ग्रन्थका नाम कबीरपंथीशब्दावली इसलिये रखा है कि, इसमें कबीर साहबके अतिरिक्त धर्मदासजीसे लेकर अनेक कबीरपंथी महात्माओंकी वाणी भी आयी है.

इस ग्रन्थमें कई चित्रभी दिये गये हैं ।

(१) चित्र सद्गुरु कबीरके जिन्दा वेषका है इसी रूपसे आपने धर्मदासजीको चेताय़ा था, क्योंकि, आप मिथ्या सांसारिक जालसे जीवोंको छुड़ाकर निरपेक्ष सत्यमार्गका उपदेश देनेको प्रकट हुए थे। यह चित्र उस समयका है जिस समय आप मगहरकी लीला करके गुप्त हो उसी शरीरसे, बांधोगढमें प्रगट होकर, धर्मदासजी और बघेलवंशके, उस समयके वर्तमान. राजा महाराजा रामसिंहको उपदेश देकर क्रुतार्थ किया था । उसी समय राजारामने आपका यह चित्र उतरवाया था जो अद्यापि उस रीवाँ के तोशाखानामें उपस्थित है । यद्यपि उस चित्रमें कफनी, नाना रंगोंके छोटे छोटे कपड़ोंके टुकड़ोंकी बनी हुई है, किन्तु फोटोमें नाना रंग न आकर काला रंग आगया है इसलिये यहाँ भी काला देख पडता है ।

(२) दूसरा चित्र कबीरपंथी वचनवंशी विन्दवंशके बारहवें आचार्य श्री १०८ पंथी उपनामसाहबका है ।

(३) तीसरा चित्र श्री १०८ पंथीदयानाम साहबका है । जिनसे, ग्रन्थोंकी भविष्यत वाणीके अनुसार वचन वंशी विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है ।

(१६)

प्रस्तावना ।

(४) कोदरमालके कबीरपंथी महासभाका है, जो पंथी दयानाम साहबके सत्यलोक वास होनेके पश्चात, सम्बत १९८४ वि० के चैत मासमें हुई थी, उन्हींमेंके कुछ उपस्थित संतमहंतोंकी मण्डलीका फोटो लिया गया था ।

(५) श्री १०८ कबीरसाहबके अधिकारी वचन वंशके नादवंशीय प्रथम आचार्य श्रीमहंत श्रीकाशीदासजी साहबका वह चित्र है जो भागलपुर के सेवकोंने उतरवाया था.

अब मैं इस प्रस्तावनाको यहाँही समाप्त करते हुए सर्व संतमहंत तथा सत्य मार्गियोंसे प्रार्थना करता हूँ कि, इस ग्रन्थकी यह पहली आवृत्ति है और भिन्न स्थानोंसे शब्दादिकोंका संग्रह किया गया है, इससे कई शब्द दुबारा आगये हैं। कई शब्द तो आरंभ एक प्रकारसे होनेपरभी मध्यमें फेरफार होनेसे दुबारा दिये गये हैं; तथा कितनी अशुद्धियाँ भी रहगयी हैं सो सब क्षमा करके आप इसे ग्रहण करेंगे और जिन जिन सुधारोंकी आवश्यकता हो उसकी सूचना इस परमार्थी अनुचरको देंगे तो, धन्यवाद पूर्वक दूसरी आवृत्तिमें आपके नाम सहित सुधारा कर दिया जायगा हाँ—गतवर्ष इसकी, भिन्न २ ग्रन्थोंसे, कापी लिखनेमें—मुंगेर जिलेके मौजे बिहट टोले मकशशपुर निवासी कबीरपंथी सेवक भूमिहार ब्राह्मण बाबू रामखेलावनसिंहने कई महीनोंतक मेरा साथ दिया था, इसलिये वह भी मुझ सहित सर्व पाठकोंके धन्यवाद और दयाभावके पात्र हैं।

कबीर आश्रम पो० खरसिया जि० विलासपुर सी. पी.

हाल

श्रीवेंकटेश्वर धर्मादा बिल्डिंग “खेतवाडी, बम्बई नं० ४”

सर्व संतों और जिज्ञासुओंका परमार्थी अनुचर

कबीरआचार्य आत्मनिष्ठ श्री. युगलानन्द विहारी.

सत्यनाथ

जिन्दा बेषमें सत्यकवीर

A black and white portrait of an elderly man with a long, full white beard and mustache. He is wearing a dark, high-collared garment and a tall, pointed traditional cap (pheta) with vertical ridges. He has a calm expression and is looking directly at the camera. The background is a plain, light color.

॥ यिरीषादवीर नाथ यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ ॥

सत्ययुग सत्पुङ्गव सतनाथा । जेता सुनीध जात कर धात्ता ॥

इसी बेषमें सद्गुरुने धर्मदासजीको चेताया था ।

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सत्यनाम ।

कवीरपंथी शब्दावलीकी साधारण अनुक्रमणिका ।

नंबरविषयपृष्ठ
मुख्यपत्र वंशावली... १
भूमिका... २
प्रस्तावना... ५
अनुक्रमणिका... १७
ध्यान देकर पढ़ो—कवीरपंथी ग्रन्थोंको
सूचीसहित... २२
मंगलाचरण... २५
शब्दावलीकी उत्थानिका... २५
१ शब्दावली... ३७
२ ग्रन्थारम्भः... ३७
१ मंगलाचरण... ३७
२ इससे लाभ क्या... ३७
३ सद्गुरुका स्वरूप शब्दकी
महिमा... ३७
४ शब्द क्या बतलाता है ?... ३७
५ इसलिये (वंशव्याख्या) परन्तु,
किन्तु ।... ३८
कवीर पंथी शब्दावली
प्रथम खण्ड प्रारम्भः ।
संज्ञा मुमिरन प्रारम्भः... ४०
१ संज्ञा गौरी... ४०
२ आरती... ४३
३ संज्ञा साखी... ४३
४ विज्ञान स्तोत्र... ४९
५ दयासागर स्तुति... ५१
(जीवके उद्धारक मार्ग)... ५२
६ चैतावनी... ५३
(सत्यकाशब्द)... ५३
७ ज्ञान गुदरी... ५५
८ रत्ना स्तुति... ५७
९ अष्टक (साहब गुरुज्ञानी)... ५८
१० स्तुति (गुरु दुषित नुभ विन्)... ५९
११ विनय (दरस दीजे गुरु परम-
(स्नेही)... ५९
१२ स्तोत्र (विदेह सूर्य)... ६०
१३ स्तोत्र (जयजय कबीर)... ६१
नंबरविषयपृष्ठ
१४नाभाजी कृत छप्पय... ६२
छप्पय भक्तमालका... ६३
१५सूचना (विचार जनक विदेहि
नानका)... ६४
१६स्तोत्र अष्टक (* मंगलरूप
अनूप पूरन)... ६४
और कवित्त अजर अखण्ड रूप... ६६
१७साखी (बारोंतन शनधन सब)... ६७
संज्ञापाठ बुरहानपुरी... ६७
* गुरु शतक सारनाम
... ६८
छन्द (नुभ होहु जाहु बयाल)... ६८
शब्द अष्टपदी स्तोत्र)
... ६९
(प्रभुजी विन् कोन छुडावे)... ६९
छन्द (साहब स्वतः प्रकाश
पारख)... ७१
अर्जनाभा अष्टक (हो सबक
अज्ञान)... ७२
अष्टक (मुखसाहब मुखरूप)... ७२
अष्टक (* मंगलरूप अनूपम
पूरन)... ७३
घनाक्षरी (अजर अखंडरूप)... ७५
आरती (आरति हो गुरु
आरति हो)... ७५
१०प्राथना स्तुति दोहा... ७६
११गुरुस्तुति छन्द... ७६
द्वितीय खण्ड प्रारम्भ ।
स्तोत्र दर्शन ।
सन्ध्या बन्दन स्तुति... ७७
कबीर मान् विद्योग सबध्या... ७८
विनय पत्रिका... ८१
ध्वनि इमन (समय ८ बजे
रात्रि)... ८५
बेधताल त्योरा (स० १० बजे
रात)... ८६

( १८ )

शब्दावली—

नंबरविषयपृष्ठ
गौड मिश्रित देश... ८७
सोरठ (समय १२ बजे रात)... ८९
बिहाग (समय २ बजे रात)... ९०
कालिंगडा (समय ४ बजे रात)... ९०
१०प्रभातो (समय प्रातःकाल)... ९१
११सैरबो (समय सुव्योदय)... ९८
१२रागिनी आसावरी (समय १० बजे दिन)... १००
१३ध्वनि पिलू (समय ३-३।। बजे दिन)... १०४
१४प्रातः संध्या साखी... १०५
१५प्रभातो स्तुति... १०७
१६कबीर भानु उदय सर्वया... १०८
१७सत्य कबीर का सत्य और मनराजाके झूठका युद्ध.... १०९
१८मध्याह्न संध्या साखी... ११२
१९मध्याह्न दिनकी स्तुति... ११४
२०माध्याह्न सर्वया... ११६
२१छोटी एकोत्तर नित्य पाठकी... १२०
२२गुरु शतकसार नाम स्तोत्र *... १२१
२३स्तोत्र (कबीर कृपालं)... १२२
२४संस्कृत स्तोत्र ३-
पृष्ठ १२६ तक... १२२
२५स्तोत्र (भो कबीर हरन पौर)... १२७
२६कबीर चालीसा... १२७
२७अर्जौ नामा (कतरहौ पुकार)... १३१
२८अर्जौ नामा (सतगुरु मिहरबान)... १३३
२९विनय अष्टपदी प्रभुजी तुम बिन (* पृष्ठ ४१)... १३७
३०दशाष्टक स्तोत्र (नमामि सर्वं सन्त)... १३७
३१स्तोत्र दशक (नमस्कार बारबार)... १४०
नंबरविषयपृष्ठ
३२स्तोत्र (जय जयदीनदयाल कृपालहितं)... १४१
३३,, (जय जय भवतारन अन्न-निवारन)... १४२
३४अष्टक (भो कबीर हरन पौर)... १४३
३५स्तोत्र संस्कृत छन्द शिखरनी... १४३
३६नाराध छन्द स्तोत्र (नमामि सर्वं लायकम्)... १४४
३७स्तोत्र (कृपालं चित्त नंदनम्)... १४५
३८स्तोत्र छन्द तोटक (परमं सदयं भवतापहरं)... १४५
३९संस्कृत स्तोत्र अष्टक... १४६
४०कबीरसा ब्राह्म्यस्तोत्र... १४७
४१गुरु स्तुति संस्कृत... १४९
४२स्तोत्र सर्वया कवित्त... १५०
४३कबीर पंचाशिका... १५१
४४गुरुस्तोत्र (कबीरमहिमा)... १५६
४५कबीरनाम महात्म्य (कबीर-कोत्तरशत भाषा कवित्त)... १६०
४६विनय रत्नावली प्रारम्भः (स्वामी श्रीपरमानन्दजी विरचित)... १८५
४७अर्जौनामा (महंत बीज-कवासजीका)... १८९
४८स्फुट विनयके छन्द कवित्त इत्यादि... १९२
४९विनयशब्दावली (श्री पूर्ण साहब छत) १९४ से २०७
५०आराधना गद्यमय स्वाधी-श्रीयुगलानंदविहारी २०७ से २११
५१गुरु सहस्र नाम संस्कृत२१२ से २१७
५२नाम लीला२१८ से २२०
५३धर्मदासजी विरचित किन्ती २२० से २२९

अनुक्रमणिका ।

(१९)

नंबरविषयपृष्ठ
५४स्तोत्र फुटकर उर्दू हिन्दी-
गजल शेर कवित्त साखी
आदि कवीश्वरोंके वचन ...२२९
५५सद्गुरुको महिमा साखियाँ २५९ से २७६
५६गजल कम्वाली प्रार्थना ...२७६
५७गुरु स्तुति संस्कृत ...२७७
५८दूसरे खण्ड की समाप्ति ...२७७
तीसरा खण्ड ।
अध्यात्म साधन (चौका
विधान) ...
गुरु पूजा प्रकरण (संगला-
चरण) 1: ...२७८
उछाह मंगल (पधरावनीके
शब्द) ...२७८
छत्तीसगढ़ी चौका विधानके
पद X ...२८१
व्यंजनभोगका शब्द ...२८१
शब्द ध्वन ...२८२
,, गारी ...२८२
,, अचवन ...२८३
,, विजना ...२८३
,, भोगकी आरती ...२८४
चौकाकी रमैनी ...२८४
चौकाके पद ...२८६
१०पद डोरी ...२८९
११चौपड ...२९१
१२चौकाकी आरती और मंगल
बन जा दिन ...२९२
१३नारियलका शब्द (मोरहु
नरियर मोरहु हो) ...२९३
१४भोगका शब्द (सत पुरुषको
भोग लागे) ...२९३
१५तिनका का शब्द (जमुनियाको
डार) ...२९४
नंबरविषयपृष्ठ
१६शब्द कंठीका (पाया निज-
नाथ गलेको हुरबा) ...२९४
१७शब्द नामका (गुरु पंड्या
लागो नाथ लखावदीजे
हो) ...२९४
१८शब्द दोहल प्रारम्भ,
दोहल ...२९५
१९आरती दर्शन जिसमें २५
आरती हैं ...३०७
आवश्यक कितापि (चौका विधानके
दूसरे भागके विषयमें इसमें
रोसडा स्थानका संक्षिप्त
वर्णन है 1) ...३१५
अध्यात्म साधन गुरु पूजा प्रकरण
दूसरा भाग “आनंदी चौका”३२१
पूर्व बिहारादि प्रदेशोंमें प्रच-
लित चौकाविधान प्रारम्भ X ...३२१
रमैनी ८ ...३२१
शब्द नारियर (वनजारिन) ...३२४
आरती चौकाकी ...३२५
शब्द भोग (सतपुरुष भोग
लागे) ...३२६
शब्द तिनका ...३२७
शब्द नाम लखावन ...३२७
शब्द कंठी ...३२८
शब्द उपदेश (घन सतगुरु जिन
दियो उपदेश) ...३२८
शब्द अजी (समुन्नति गहो मोरि
वाहीं) ...३२९
१०पान परवानाका शब्द ...३३०

X इस हेंडिगमें पृष्ठ २८१ पर “चौका विधान के पद” के बदले “चौकी विधानकी पद” छप गया है सो पाठक सुधार लेंगे ।

(२०)

शब्दावली—

नंबरविषयपृष्ठ
चलावा चौका प्रारम्भः ।
मंगल (सतगुरु हंस उवारन जगमे आइया) . . .३३०
दीहल प्रारम्भः (१) . . .३३१
शब्द नारियर . . .३३५
डोरी पदप्रारम्भः (चलावा चौका का) . . .३३६
शब्द व्यंजन भोग (३२६ *) . . .३४०
अचवन (*सेवक लिये प्रेमजल झारो ३२८) . . .३४१
शब्द धुन (*३२६) . . .३४२
गारी प्रारम्भ (३२७) . . .३४३
१०लम्बेब चौका(मे गाने योग्य नाना प्रकारके राग रागनियोंके शब्द पढ़ादि) . . .३५०
११चौका आरती महात्म्य . . .३८२
१२कबोरपंथके धार्मिक सामान्य ११ नियम . . .३९६
तीसरे खण्डके विषयमें सूचना . . .३९७
१३मूल रमनी अर्थात् शब्द कुंजी . . .३९८
१४आदि वाणीका शब्द . . .४१०
१५कडिहार भेदका शब्द . . .४११

चौथा खण्ड प्रारम्भः ।

१६सत्य कबोरकी आगमवाणी . . .४१२
१७राम परखकी रमनी . . .४१३
१८निरख प्रबोधकी रमनी १ . . .४१४
१९शब्द पारखकी रमनी (सिगी शब्द) . . .४१६
२०सर्वांग बत्तीसी रमनी . . .४१८
२१रमनी सोलह तिथिकी . . .४२२
२२रमनी अक्षरखण्डकी . . .४२३
२३रमनी प्रेम अछरकी . . .४२४
२४रहनी गहनी . . .४२५
२५यम जाल . . .४२५
२६सांचा कडिहार . . .४२५
२७सत्य नाम . . .४२६
नंबरविषयपृष्ठ
२८रहनी पहचान . . .४२७
२९अष्टाङ्गयोगकी रमनी . . .४२७
अविगत योग . . .४२७
कर्म योग . . .४२८
सत्कर्म योग . . .४२८
सांख्य योग . . .४२८
ज्ञान योग १ . . .४२९
विचार योग २ . . .४२९
विवेक योग ३ . . .४३०
शीलयोग ४ . . .४३०
संतोष योग ५ . . .४३०
१०निर्वे' योग ६ . . .४३१
११सहज योग ७ . . .४३२
१२शून्य योग ८ . . .४३२
१३अष्टाङ्ग योगका सार . . .४३३
ज्ञान परीक्षा . . .४३३
विचार परीक्षा . . .४३३
विवेक परीक्षा . . .४३३
शील परीक्षा . . .४३४
संतोष परीक्षा . . .४३४
निर्वे' परीक्षा . . .४३४
सहज परीक्षा . . .४३५
शून्य परीक्षा . . .४३५
३०करीमकी हिकमत . . .४३६
३१काया मजिद . . .४३६
३२रमनी मन (१) . . .४३६
मनराजा (२) . . .४३७
३३रमनी कथता वकता (१) . . .४३७
बोलना (२) . . .४३८
३४रमनी सात गुहकी . . .४३८
३५निर्बान देसकी . . .४३८
३६गुहकी (१) . . .४३९
विरह वार्ताकी . . .४३९
गुरुटंककी (२) . . .४४०
गुरु महिमाकी (३) . . .४४०
३७जुलाहाकी . . .४४१
३८स्वरूप महिमाकी . . .४४१

अनुक्रमणिका ।

( २१ )

नंबरविषयपृष्ठ
३९कालजीतकी४४२
४०रमैनी निर्बान पदकी४४२
४१स्वरूप पहिचानकी४४३
४२रमैनी निर्बान एकतारकी४४३
४३ज्ञान विरहकी४४४
४४घट दर्शनकी४४४
४५योग योगकी४४५
४६आदि रमैनी४४५
४७एक ओंकारकी४४६
गुरु महिमा (४)४४६
४८रमैनी गृही रहनीकी४४७
४९रमैनी बेरागी (साधु) रहनी की
रमैनी बेरागी गुरुशिष्य अधिकारी४४८
४४९
५०रमैनी बेरागी कर्मखण्डकी४४९ से ४५४
५१पंच देह निर्णय
निरख पत्रोद्यकी रमैनी २४५४ से ४६०
निरख प्रबोध (३)४५९
५२बीजककी रमैनी ८४
निरख प्राबोधकी रमैनी ४-१० तक४६१
४८९ से ४९५
५३ज्ञान चौतीसा (केता कह कबीर १)
ज्ञान चौतीसा (काया कुंजकरमकी
बारो २)४९६ से ५००
ज्ञान चौतीसा चौतीसा बीजककी५००
५०९
५४विप्रमतीसी (बीजककी)५१२
५५कहुरा (बीजकका)५१३
५६चाँचर५१९
५७बेलि५२१
५८विरहुली५२२
५९हिंडोला५२३
नंबरविषयपृष्ठ
गुरु महिमाकी रमैनी १८ (६)
५२४ से ५३५
गुरु उपदेश महिला (७) ... ५३५
(३२)शब्दावली-अनुक्रमणिका समाप्त .
शिष्यकी अधीनता (८) ... ५३७
गुरुसेवा महात्म्य (९) ... ५३७
गुरु भावना (१०) ... ५३७
गुरु चरणोदक महात्म्य (११) ५३८
६०ज्ञानदीपककी रमैनी ५३९ से ६३५
६१तत्त्व दर्शन साखियाँ (पंचीकरण)
६४० से ६५०

खण्ड पाँचवा प्रारम्भ ।

६२१ वसंत प्रारम्भ (७०) ६५१ से ६७७
२ होरी प्रारम्भ: (४९) ६७८ से ७००
३ फाल प्रारम्भ: (४) ... ७००
४ धमार प्रारम्भ: (२७) ७०२ से ७१४
६३चाँचर ... ७१४
६४कहुरा प्रारम्भ: (३६) ७१५ से ७२८
६५गौरी प्रारम्भ: (५०) ७२८ से ७४३
६६राग कल्याण (१५) ७४४ से ७४८
६७राग कान्हुरा (२५) ७४९ से ७५६
६८राग काफो (१६) ७५६ से ७६१
६९मंगल (१०) ७६१ से ७६५
७०तीसा मंत्र (३०) ७६५ से ७६९

छठा खण्ड प्रारम्भ: ।

७१शब्द प्रारम्भ: (३८८) पृ. ७७० से ८९८
७२शब्द बीजक ११५ ८९८ से ९३२
७३भेदवाणी ... ९३३
७४गजल कल्याली ... ९३७
७५सुवाबतीसी (सम्याभगवतीदास
विरचित) ... ९३९
७६शब्दार्थ चिन्तामणि कोष ... ९४४

इति श्रीकबीरपंथी शब्दावलीकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका समाप्त शुभम् ।

सत्यनाम ।

ध्यान देकर पढो ।

कबीर पंथियो !

उठो ! जागो ! और चेतो यह समय तुम्हारे पंथके लिये बड़ा कठिन आया हुआ है । इस समय तुम्हारे पंथकी दशा डावांडोल हो रही है । तुम्हारे वचन वंश गद्दीके विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है । नाद वंशकी गद्दी स्थापित होने पर भी, धर्म ग्रन्थोंको भली प्रकार नहीं जाननेके कारण, सेवक सती, साधु संत, महंत और गुसाई सब कल्पनाकी हवाई जहाजमें उड़ते फिरते हैं । किसीको भी स्थिरता नहीं मिलती है । सेवकोंमें जो माननीय हैं वह अपनीही चलाना चाहते हैं, भेष उनकी दृष्टिमें निर्मल्य जैसे दीख पड़ती है; भेषों में कुसम्प होनेके कारणसे उनका बल दबसा गया है । अपने सत्य सिद्धान्तको दृढ़तासे पकड़कर चलानेके बदले, नाना मति और भिन्न २ विचारके कारण, मनमतके जालमें फँस गये हैं जिसके मन में जो आता है उसी को वह सिद्धान्त समझकर, सत्यगुरुमत का अनादर कर रहा है । यह सब क्यों हो रहा है ? केवल सद्गुरु कबीरकी वाणियों और कबीरपंथके ग्रन्थोंपर ध्यान नहीं देनेसे । अब अपना समय व्यर्थ पक्षपातमें पड़कर नष्ट मत करो—क्योंकि, सद्गुरु कबीरका वचन है ।

“पछापछीके कारने, सब जग गया भुलान ।

निर्पच्छ होइके हरिभजे, सोई संत सुजान ॥”

इसलिये मिथ्या पक्षपातको छोड़कर सत्य गुरु कबीरके शब्दोंके आश्रय अपना कल्याण दूँढो—क्योंकि.

“गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय ।

ताको काल घसीटिहै, राखि सकै नहिं कोय ॥”

इसी, लिये आगम संदेशमें, सद्गुरु कबीरने कहा है—

“शब्दहिं गहे सो पंथ चलावे ।

विना शब्द नहिं मारग पावे ॥”

देखो इस समय कबीरपंथी मात्र कबीर की वाणी वचन और शब्दोंको छोड़कर अपना पंथ खो बैठे हैं—क्योंकि, —जब आगम वाणीमें कहा है —

“तेरहैं पीढी ज्ञान रजधानी, चूरासरन औतारा हो ।

उनके अंग छाया नहिं होई, देह विदेह अपारा हो ॥

उनके आगे जोग मत चलिहैं, राजनीति उठजाई हो ॥

पांचस्वादकी इच्छा नाहीं, सो मति सब उन आई हो”

२३

देखो इस वाणीमें स्पष्ट लिखा है—तेरहें पीढीके समाप्त होनेपर—ज्ञानका दौरा आयेगा और चूरासनका औतार होगा—उस चूरासनके अंगमें छाया नहीं होगी क्योंकि, उसकी देह विदेह होगी ।

आगम संदेशमें “चूरासन” का भाव यों दर्शाया है—“परगटे वचन चूरासन अंसू । शब्दरूप सब जगत प्रसंसू ॥ शब्दे पुरुष शब्दे गुरुराई । विना शब्द नहिं जिव मुक्ताई ॥ जाते जीव मुक्त हो भाई । मुक्तात्मन सोइ नाम कहाई ॥”

इस समय शब्दकी ओर ध्यान न देने वाले और अपने अपने मनपरही चलने वाले, प्रायः सेवक सती संत महंतों की मानता होरही है कि, चूरासन कोई देह धारी पुरुष प्रकट होकर पंथ चलायेगा । इसी कल्पना और संशयमें डोला खाते हुए अधिकांश लोग कबीर पंथसे वेपंथ जाकर, कालके फन्देमें पड़कर, अपना किया कराया सब नष्ट कर रहे हैं । उन्हें इतनी समझ नहीं है कि, वचन चूरासन कोई देहधारी पुरुष नहीं है । वह तो कबीर, सद्गुरु कबीरका ज्ञान विचार और वाणी-है । ऊपरके वचनमें स्पष्ट कहा है—“शब्दरूप सब जगत प्रसंसू” प्रत्यक्ष देखो—कबीरकी वाणीका संसार भरमें कितना आदर है और तो और संसारभर को काफिर कहने वाले मुसलमान भी कबीरके साखी शब्द और वाणी वचन को मुश्दिद बरहक्क (सद्गुरु) की वाणी कहकर मानते और आदर देते हैं । आर्थ्य समाजियों को ही ले लो, उन्हें, स्वामीदयानन्दकी उटपटांग अर्थहीन लिखी बातों को भुलाकर, कबीर की वाणी और सिद्धान्तको झखमारके आदर देना पड़ता है वर्तमान के आर्थ्य समाजियोंके ग्रन्थोंमें तुम्हें प्रायः कबीरकी वाणीके प्रमाण मिलेंगे—

कितने ऐसे कबीरपंथी हैं जो फिरसे पिछले राज्यकी स्थापना करना चाहते हैं । उनको इतनी स्पष्ट बात भी नहीं समझ पड़ती है कि, जब स्वतः कबीर मुख वचन है कि, तेरहों पीढीके पश्चात् उसीके अमलमें, राजनीति उठजायगी और ज्ञान राजधानी चलेगी, तब भी वे राज्य स्थापना करनेके लिये—वर्तमान राज्य शासनका आश्रय लेकर अपना मन माना करना चाहते हैं । इसका परिणाम यही है कि, कबीर वचनके अनुसार स्थापना तो ज्ञानकी ही होगी और उस ज्ञानको प्रगट करनेवाले कबीरके वे शब्द जो मनको चुरा करके सत्यपंथमें लगावेंगे