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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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देखो इस वाणीमें स्पष्ट लिखा है—तेरहें पीढीके समाप्त होनेपर—ज्ञानका दौरा आयेगा और चूरासनका औतार होगा—उस चूरासनके अंगमें छाया नहीं होगी क्योंकि, उसकी देह विदेह होगी ।

आगम संदेशमें “चूरासन” का भाव यों दर्शाया है—“परगटे वचन चूरासन अंसू । शब्दरूप सब जगत प्रसंसू ॥ शब्दे पुरुष शब्दे गुरुराई । विना शब्द नहिं जिव मुक्ताई ॥ जाते जीव मुक्त हो भाई । मुक्तात्मन सोइ नाम कहाई ॥”

इस समय शब्दकी ओर ध्यान न देने वाले और अपने अपने मनपरही चलने वाले, प्रायः सेवक सती संत महंतों की मानता होरही है कि, चूरासन कोई देह धारी पुरुष प्रकट होकर पंथ चलायेगा । इसी कल्पना और संशयमें डोला खाते हुए अधिकांश लोग कबीर पंथसे वेपंथ जाकर, कालके फन्देमें पड़कर, अपना किया कराया सब नष्ट कर रहे हैं । उन्हें इतनी समझ नहीं है कि, वचन चूरासन कोई देहधारी पुरुष नहीं है । वह तो कबीर, सद्गुरु कबीरका ज्ञान विचार और वाणी-है । ऊपरके वचनमें स्पष्ट कहा है—“शब्दरूप सब जगत प्रसंसू” प्रत्यक्ष देखो—कबीरकी वाणीका संसार भरमें कितना आदर है और तो और संसारभर को काफिर कहने वाले मुसलमान भी कबीरके साखी शब्द और वाणी वचन को मुश्दिद बरहक्क (सद्गुरु) की वाणी कहकर मानते और आदर देते हैं । आर्थ्य समाजियों को ही ले लो, उन्हें, स्वामीदयानन्दकी उटपटांग अर्थहीन लिखी बातों को भुलाकर, कबीर की वाणी और सिद्धान्तको झखमारके आदर देना पड़ता है वर्तमान के आर्थ्य समाजियोंके ग्रन्थोंमें तुम्हें प्रायः कबीरकी वाणीके प्रमाण मिलेंगे—

कितने ऐसे कबीरपंथी हैं जो फिरसे पिछले राज्यकी स्थापना करना चाहते हैं । उनको इतनी स्पष्ट बात भी नहीं समझ पड़ती है कि, जब स्वतः कबीर मुख वचन है कि, तेरहों पीढीके पश्चात् उसीके अमलमें, राजनीति उठजायगी और ज्ञान राजधानी चलेगी, तब भी वे राज्य स्थापना करनेके लिये—वर्तमान राज्य शासनका आश्रय लेकर अपना मन माना करना चाहते हैं । इसका परिणाम यही है कि, कबीर वचनके अनुसार स्थापना तो ज्ञानकी ही होगी और उस ज्ञानको प्रगट करनेवाले कबीरके वे शब्द जो मनको चुरा करके सत्यपंथमें लगावेंगे

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