कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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उसी चूराभनका प्रकाश अब विशेष होगा। किन्तु काल निरञ्जनके वहकावटमें पड़े मिथ्या मान गुमानको लिये, वे भूले हुए जीव, भ्रमके आश्रय. सन्तमहंत भेष और कबीर धर्मदासके विरुद्ध, अपना राज्य स्थापित करनेमें लगे हैं और राज-कचहरियोंमें मारे मारे फिरते हैं। उनको न तो अपनी समझ है, न किसी जानकार का वचन सुनना चाहते हैं कि, यह सब कालकी बाजी है, इससे सत्य धर्मका कोई सरोकार नहीं है। कबीर प्रत्यक्ष रूपसे कहते हैं—
“राजद्वार जावे नहि कबहीं। कैसो कष्ट आवे पुनि जबहीं ॥ महिमा वंश तबै मिटजाई। राजद्वारे द्रव्य लुटाई ॥ होवे वैर नगरमेंभारी। कलिजुग राज करे सुख छारी ॥ कलिजुग होय मलेच्छ सो राजा। जो बिगरे तो होय अकाजा ॥”
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण, कबीर कॉसिल और उसके संचालकोंका परस्पर का झगडा है।
कहांतक कहाजाय मनमतका पार नहीं है। इस मनमतके वश पडकर लोभ वश कितने साधु संत महंत नामधारी जीव भी, उसी घसीटनमें पडकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं।
इसी लिये हे प्यारे सत्य धर्मके खोजी कबीरपंथियो! मिथ्या अभिमान और मनमतको त्यागकर, कबीर धर्मदासके ग्रन्थ और वाणीका विचार करके, वर्तमानके उलझनोंको सुलझाओ और अपना अमूल्य जीवन सफल करो—
श्री वेंकटेश्वर और लक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेसने आपहीके पंथकी रक्षाके लिये कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन किया है।