भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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मंगला वरण ।

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।

तं कवीरमहं वन्दे मनोवाक्कायकर्मभिः ।

सत्सुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुरुष

मुनीन्द्र करुणामय कवीर सुरतयोग

संतायन धनी धर्मदासकी दया

सर्व संत महंतोंकी दया—

अथ शब्दावलीकी उत्थानिका—

सद्गुरु कवीरने संसारी जीवोंके चितानेके लिये अनंत शब्दोंका प्रकाश करके, भवसागरसे पार करनेका प्रशस्त मार्ग तय्यार कर दिया है। तथापि बलि-हारी है, कालभगवानकी कि, अपना राज्य बना रखनेके लिये सत्यमें भी असत्यकी मिलौनी कर कुछ का कुछ कर दिखाता है ।

जहां सद्गुरुका वचन है कि—

पच्छा पच्छी कारने, सब जग गया भुलान ।

निर्पछ होइके हरिभजे, सोई सन्त सुजान ॥

वहां सद्गुरुका नाम रखकर कालने सत्यशब्दमें इतनी मिलौनी करदी है कि, संसारी जीवोंको निर्पक्ष वाणीकी पहचान ही नहीं होती, उलटा वे कालकी वाणीको ही सिद्धान्त वाणी समझकर उन्हींमें भूलकर साम्प्रदायिक गर्तमें गिर पड़े हैं और जबतक सद्गुरुके बताये संकेतके अनुसार सत्यशब्दको जाननेका प्रयत्न नहीं किया जायगा तबतक वे भवसागरमें गोता खातेही रहेंगे ।

सद्गुरु कालवाणीसे सत्यवाणीको अलग करनेकी कैसी सरल युक्ति बता रहे हैं ।

अनबनि वानी चार प्रकार । काल सन्धि झाई औ सार ॥

अब इनकी पहचान बतलाते हैं —

कालशब्द ।

अक्षर पूजा सेवा जाप । और महात्म जेतें थाप ॥

यही कहावत अक्षर काल । जाय गडी उर होयके भाल ॥