कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(२६)
[ शब्दावली—
सन्धिशब्द ।
ओहं सोहं आतमाराम । भाया मंत्रादिक सब काम ॥ यहि सब अक्षर संधिक कहै । जेहिमा निशिवासर जिव रहे ॥
झाईशब्द ।
निर्गुण अलख अकह निरवान । मन बुधि इन्द्रीय जाय न जान ॥ विधिनिशोध जहैं बनत न दोय । कह कबीरपद झाई सोय ॥
— इनमेंसे —
भरमिक संधि झाई औ काल । सारशब्द काटे भ्रमजाल ॥
— इस लिये —
परे जीब तेहि जमकी धार । जौलौं पावे शब्द न सार ॥
— इसहेतु —
जीब दुसह दुख देखि दयाल । तब प्रेरी प्रभु परख रिसाल ॥
शब्दकुंजी.
विशेष जाननेके लिये इसी ग्रन्थमें छपे हुए शब्द कुंजी (अथवाभूलरमैनी जिसको बहुधा लोग सताइस रमैनी भी कहते हैं—) को गुरुमुख द्वारा विचारना चाहिये । क्योंकि.
बंद उर्दधि बिनु गुरु लखे, लागत लौन सखान ।
बाबर गुरुमुख द्वार ह्वै, अमृत सूं अधिकान ॥
आजकल छापा होने और ग्रन्थोंके सहजमें मिलनेके कारण और स्कूलोंकी बाहुल्यतासे, लोग अक्षर पढ़ना सीखकर ग्रन्थोंको आपही आप पढ़कर, बिना समझे बूझे ही स्वतः गुरु बन बैठें हैं । इसीलिये जहां देखिये वहां नास्तिकताका प्रचार होकर प्रायः सब पंथ और सम्प्रदायवाले, भवसागरमें उबड़ुब कर रहे हैं ।
यथार्थ भावको समझे विनाही, मिथ्या पक्ष धारण कर लोग मनमती बन गये हैं; उनको इतनी समझ ही नहीं है कि, पक्षपातके सिवाय भवसागर दूसरा है ही नहीं ।
पक्षहि भवकर जानिये, दूसर भव है नाहि ।
जन्म भरण सुख दुख सुभाव, तिन्हें अभावहि काहि ॥
कबीरके नाम, उनके नामसे वाणीका प्रचार भारतके कोने कोने पाया जाता है । यह नहीं कि, बहुत दिन बीतने अथवा वर्तमान कालके रेल डाक और प्रेसके सुभीता के कारण इसका प्रचार हो गया हो, बरन कबीरकी वाणीका प्रभाव ही ऐसा है कबीरका उपदेशही ऐसा सार्वजनिक और निर्पक्ष था कि, उनके वर्तमान रहते ही,