भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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उत्थानिका]

(२७)

साखी और शब्दोंका इतना प्रचार हो गया था कि, मारवाड और गुजरात आदि देशोंमें, उसी समय पद और वाणियों तथा साखियोंका संग्रह कर लोगोंने ग्रन्थरूप में बना लिया था.

थोडे दिन हुए हैं ऐसाही एक ग्रन्थ, रायबहादुर बाबू श्याम सुन्दर दासजीने नागरी प्रचारिणी सभाकी ओरसे छपाकर प्रकाशित कराया है—जिसका नाम कवीर ग्रन्थावली रखा है—बाबू साहबकी सम्मतिसे वह ग्रन्थ कवीर साहबके मगहरमें गुप्त होनेकी लीलाके पश्चात् केवल पचास वर्षकाही है. यद्यपि बाबू साहबकी दृष्टिमें उस समय कवीर साहबका अवसान हो गया था तथापि कवीर-पंथी और अन्यलेखकोंके प्रमाण से—कवीर साहबने मगहरमें अन्तिम लीला करके भी शरीर नहीं छोड़ा था. यों तो जब आप अपनेको शब्दरूपही कहते हैं तब आपके शरीर छोड़नेकी बात ही क्या है.

क्योंकि,

पांच तत्त्वसे है नहीं, स्वासा नाहि शरीर ।

अस अहार करता नहीं, ताका नाम कबीर ॥

तथापि अपने हिन्दू मुसलमान शिष्योंकी परीक्षा करनेके लिये, आपने मगहर में लीला दिखाई थी और शिष्योंको जो उपदेश देना चाहा सो दे चुकनेपर तत्कालही आप उसी शरीरसे मथुरामें प्रकट हुए और वहांसे अमर कंटक आदि स्थानोंमें अपना अमर चिह्न छोड़ते हुए चांधोगढ़ पहुँचे और धर्मदासजीको उपदेश दे जगन्नाथकी ओर चले गये ।

इससे यह सिद्ध होता है कि, बाबू साहबने जो ग्रन्थ छपवाया है वह जिस सम्बतका लिखा हुआ है उस समयमें कबीर साहब उसी काशीवाले शरीरसेही वर्तमान थे और कवीर साहबके इतने निकट समय या वर्तमानमें ही ग्रन्थ लिखे जानेके कारण, बाबू साहब कवीर साहबकी वाणीकी भाषाको भी वैसी ही समझते हैं जैसी उस ग्रन्थमें लिखी है और इसी दृष्टिसे आपने उसे वैसीही छपवाया है ।

किन्तु यह किसीसे छिपी नहीं है कि, कवीर साहब अपना केंद्र काशी ही बनाकर वहांही प्रकट हुए और वहांकीही प्रचलित हिन्दी भाषामें आपने वाणीका भी प्रकाश किया था. तथापि मारवाड देशमें जाकर वाणी मारवाडी मिश्रित क्यों हो गयी ? इसका कारण यह हो सकता है :-

(१) कबीर साहबका उपदेश इतना सर्व प्रिय था कि, आपके वर्तमान रहतेही देश देशान्तरोंके लोग, उपदेश और वाणी सुनकर लिख लेते और बड़े प्रेम से रखते थे और अपने स्वाभाविक उच्चारणके अनुसार उसे गाते और बोलते