कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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[शब्दावली—
भी थे जिससे उसी उसी देशके उच्चारणके अनुसार लिखनेमें वाणीका रूपभी वैसाही बनता गया। जैसे आजकल भी गुजरात या महाराष्ट्र प्रान्तमें हिन्दी भाषा या हिन्दी भाषाकी कविताकी दशा है। और गुजराती या मराठीभाषावाले अपने स्वाभाविक उच्चारणके कारण विशेष नामोंको भी अपने उच्चारणके अनुसारही लिखते और बोलते हैं। दृष्टान्तके लिये संयुक्त प्रान्तके “मेरठको लिजिये आजकल प्रसिद्ध मेरठ कैंसके कारण वर्तमानपत्रोंमें मेरठका नाम बारम्बार आता है इतना प्रसिद्ध नामहोनेपर भी गुजराती पत्रवाले मेरठको “भीरत” ही लिखते हैं।
इसी प्रकारसे यदि कवीरसाहबकी वाणी उस समय मारवाड आदि देशोंमें जाकर मारवाडी आदि उच्चारणोंवाली होगयी हो तो कौन आश्चर्यकी बात है।
मैंने मारवाड, पञ्जाब, सिन्ध, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, बंगाल, आसाम, भूटान, नेपाल और बिहार आदि प्रान्तोंके भ्रमण कालमें देखा है, हिन्दीमें और शुद्ध हिन्दीभाषामें छपे हुए ग्रन्थोंको जिस जिस प्रान्तके लोग पढ़ते हैं, उस प्रान्तके टोन (स्वर) का प्रभाव उन ग्रन्थ और वाणियों पर ऐसा पड़ता है कि, सुननेवालोंको वह उसी देशकी भाषामें लिखा जान पड़ता है।
गत वर्ष जब मैं वंशधरकी गद्दीके सर्वमेष समस्त आचार्य श्री १०८ पं श्रीकाशी दास साहबजीके साथ तिरहुतके कतिपय स्थानोंमें भ्रमणको गया था, तब वहाँके भावुक सेवक सती और साधुओंके, प्रेम मग्न भजनकीरतन को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता और प्रभावका अनुभव करता था। किन्तु शुद्ध हिन्दी भाषामें छपे हुए शब्दोंको भी जब वे गाने लगते थे तब, उनका उच्चारण ठीक तिरहुतिया भाषाके समान सुन पड़ता था, इतनेही नहीं शब्दोंके क्रियापद आदिको भी वे अपने प्रांतिक रूपमें बदलकर बोलते थे कारण मात्र यही है कि, वे थोड़े पढ़े लिखे लोग अपने स्वभाव और आदत तथा प्रेमके वश होकर शुद्ध अशुद्धिका विचार किये बिनाही प्रेममें मग्न होकर भजनमें लीन होते और लिखते भी हैं।
इसी प्रकार मारवाड और पंजाबवाले पानीको पाणी आदि उच्चारणके अभ्यासके कारण शब्दोंको अपने प्रांतिक टोनमें बदल लेते हैं। गुजराती और काठियावाड वालों का कहनाही क्या, जिस समय वे तम्बूरा और मजीरेकी गगन भेदी झंकारमें मस्त होते हैं—“कहत कवीरा सुनोभाई साधो” के गानमें ऐसे