कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२९)
लीन होजाते हैं कि, जो कुछ वह गाते हैं चाहे वह किसी भाषाका हो सब उन्हें काठियावाडी या गुजरातीही जान पडती है ।
इसी प्रकार दक्षिणी मराठी भाषाभाषी जिस समय “कबीरांचे दोहरे” और पदे” की हांक लगाते हैं, उस समय कबीर उन्हें खास मराठी भाषाभाषीही जान पडते हैं, और कबीरके शब्दोंका उच्चारण ठीक मराठी जैसा जान पडता है, इसी प्रकार महाराष्ट्रके पढे लिखे लोग भी जब कभी अपने ग्रन्थ या भाषण आदिमें कबीरकी साखी आदि कोट करते हैं वहाँ उसमें इतना मराठीपन आजाता है कि, फिर उसे हिन्दीभाषाभाषी कबीरकी वाणी कहनेसे हिचकते हैं इत्यादि । ( २ ) यदि उपर्युक्त विवेचनके विरुद्ध कोई ऐसा समझता हो कि, कबीर जिस जिस देशमें गये, उस उस देशकी भाषामें ही, उन्होंने वहाँके लोगोंको उपदेश दिया, तो यह बात भी उनका महत्त्वही प्रकट करती है—
किन्तु मेरा निश्चय है कि, कबीरसाहबने जो कुछ कहा है वह सब उससमय की प्रचलित हिन्दीमेंही कहा है
इसी विचारको लेकर मैंने भारतके अनेक प्रान्तोंमें घूमकर सहस्रों कबीर-पंथी ग्रन्थोंका संग्रह किया है—जिसमें एकही नामके ग्रन्थकी भिन्न भिन्न प्रान्तोंमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। अब जब मैं उनका मिलान करने बैठता हूँ तब वाणी एक होनेपरभी लिखावट और उच्चारणमें बहुत अन्तर जान पडता है और जिस समय उस उस प्रान्तके लोग अपने अपने प्रान्तके लिखे ग्रन्थोंको पढ़ते हैं, उस समय सुननेसे औरही भाव अन्तःकरणमें उदय होता है ।
इस प्रकारके कई दृष्टान्त इस ग्रन्थके बीच बीचमें या अन्तमें लिखकर पाठकोंका मनोरंजन करूंगा,
लिखते लिखते मैं कहींका कहीं चला गया—इसलिये अब प्रकृत विषय पर आता हूँ ।
शब्दावली ।
यों तो—कबीरकी शब्दावली—कबीर साहबना भजन, कबीरांचे पदे और दोहरे आदि नामसे सैकड़ों पुस्तकें लाखोंकी संख्यामें हरसाल छपती और छोटे २ जंगली देहातों बाजारों और बड़े २ शहरोंतक बिकती रहती हैं और हिन्दू मुसलमान ईसाई इत्यादि सभी धर्मके लोगोंकी जवानपर कबीरकी साखी मसले वर्तमानही रहते हैं, किन्तु “शब्दावली” के नामसे बड़ी पुस्तक एकही छपी है—जिसकी दो आवृत्ति आजतक हो चुकी है ।
उस शब्दावलीमें केवल कबीर साहबही नहीं वरन बहुतसे लोगोंकी वाणीका