भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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[शब्दावली—

संग्रह है—जिसे कवरदहके एक वैरागीने संग्रह किया था और अपने हाथसे लिख लिखकर, वहां जानेवाले संत महंतोंके हाथसे बेचा करता था। यद्यपि वह उसकी कीमत लोगोंसे २०, २५, रुपया लिया करता था। तथापि पैसेवाले महंत संत लोग जो वहां जाते थे, वह अपने स्वार्थके मारे लेलिया करते थे। क्योंकि, महंतोंके सबसे अधिक स्वार्थ, चौका आरतीकी रमैनी आदि उसमें दियी हुई होती थी। इसी बातको दृष्टिमें रखकर ग्रन्थ लेनेवालोंको केवल स्वार्थलोलुप समझकर वह लिखने वालाभी पहले चौका आरतीकेही पद और रमैनी लिखता था। उसकी लेखन शैली और ग्रंथका प्रबन्ध देखकर तो जान पड़ता है कि, उसे भी इस ग्रन्थसे सिवाय द्रव्य प्राप्तिके दूसरा कोई सरोकारही नहीं था। इसी लिये उसने उस ग्रन्थका क्रम-बांधनेका प्रयत्न नहीं किया, वरन उसके उलटा जो कुछ उसे जहांसे मिला चाहे वह किसीका शब्द या पद भजन रहा हो “कहें कबीर” करके उसे लिख दिया।

जब तक वंशघरकी गद्दी कवैरदह रही तबतक तो उसका व्यापार चलता रहा किन्तु, वंशघरकी गद्दीके लिये विरोध चला और गद्दीका कारबार कवैर-दहसे कोदरमाल चला आया और वंशघरके सन्त महंतोंने उग्रनाम साहबको अपना आचार्य मान लिया, और लोगोंका कवरदह जाना आना छूट गया, तब उस शब्दावली लिखनेवालेका रोजगार मरा और सन्तमहंतोंको शब्दावलीका सहज में, २०, २५, खर्च करके भी मिलना बन्द हुआ। तब नये बननेवाले महंतोंको शब्दावलीकी आवश्यकता पड़नेपर न मिलनेसे अडचन पड़ने लगी, महंतोंके उस अडचन को उग्रनाम साहबने अनुभव किया और शब्दावलीको छपानेकी आवश्यकता समझी, किन्तु उस समय उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि, वे इसमें अपनी ओरसे कुछ कर सकते, इसलिये उन्होंने इशारेसे उसी शब्दावलीकी एक कापी बम्बई पहुंची और विना शुद्ध या क्रमबद्धकिये ज्यों की त्यों छापदी गयी इतना भी विचार नहीं किया गया कि, किस विषयके शब्द पहले आने चाहिये और किस विषयके पीछे, इसमें कबीर साहबके शब्द कितने हैं और इतरोंके कितने, इन बातोंके विचार किये विनाही आंख मूंदकर ग्रन्थ छपकर तय्यार होगा, उसपर तुरां यह हुआ कि, ग्रन्थके मुख्यपत्र (टायटल) पर “महात्मा श्री कबीरजी साहब कृत” “अपूर्व ग्रन्थ” छपा गया।

इस बातको देखकर समझदार कबीर पंथियोंको बड़ा कष्ट हुआ क्योंकि, उक्त ग्रन्थमें कितने शब्द ऐसे हैं जो कबीर साहब तो क्या कबीरपंथियों के भी नहीं हैं। कितने शब्द ऐसे हैं कि, दूसरोंके होनेपर और उसमें कर्ताका नाम वर्तमान