भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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उत्थानिका । ]

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रहनेपरभी अन्तमें कहँ कबीरका छाप लगाकर कबीर साहबको बदनाम किया गया है इत्यादि।

इसके पश्चात् ही श्रीउग्रनाम साहबकी इच्छा और इन्दौरके प्रसिद्ध विद्वान् महोपदेशक सदगुरु श्रीमहंत शम्भुदासजीके उत्साह और मेरे प्रयत्नसे सम्बत् १९६० वि. का कबीरपंथी महासंत समागम कोदरमालमें हुआ, जिसमें श्रीमहंत शम्भुदासजीकी सम्मतिसे अथाह परिश्रम करके मैंने भारत वर्षका दौरा कर सर्व देशोंके संत महंतोंको एकत्रित किया और वंशगद्दीके झगडेके कारण जो पार्टी बंध गयी थी उसे तुडवाकर, वंशघरके सर्व संतमहंतोंको एकही सूत्रमें बाँधनेके लिये सबमें उग्रनाम साहबकेही पंजेका प्रचार करवाया । इस कार्यके करनेमें यद्यपि मुझे अनन्त कष्ट और दुःख उठाना पडा, यहाँतक कि, अदालतोंमें भी घसीटा गया तथापि सदगुरु श्रीमहंत शम्भुदासजीके उत्साहसे, सब अडचनोंको दूर करके कार्य पूरा करकेही विश्राम लिया उस उक्त महा सभामें तीन लाखसे भी अधिक कबीर पंथी इकट्ठे हुए थे ।

महासभाके पश्चात् जब पं श्री० उग्रनाम साहबकी गद्दी दामा खेडामें स्थापित हुई, तब उन्हें स्वतंत्रता मिलनेमें निजधर्म और नामकी उन्नति करनेकी भी अभिलाषा उत्पन्न हुई । उन्हीं अभिलाषाओंमें “ग्रन्थ छापनेके” लिये प्रेस खोलनेकी भी एक अभिलाषा थी.

दामाखेडेमें प्रेस खुला और, अन्यकामोंके साथ शब्दावलीको छापनेकी भी चर्चा आरम्भ हुई, उस समय मैंने अपना मन्तव्य प्रकट करके चाहा कि, शब्दावली इस रूपमें छपाजाय कि, जिसमें दूसरोंको आक्षेप करनेका अवसर न मिले. किन्तु उग्रनाम दबू स्वभाव और उनके परिवारवालोंका द्वेष के कारण मेरी प्रत्येक बातोंके विरोध करने और प्रेसके मैनेजर दीवान हंसदासके रहनेके कारण, मेरा वश नहीं चला. ग्रन्थके सम्पादक बने बाबा साहब और छपानेवाले मैनेजर और प्रिंटर दीवान हंसदास ।

यहाँपर यह जता देना अनुचित न होगा कि, दामाखेडेमें प्रेस खोलनेमें प्रबल और मुख्य कारण मेराही प्रयत्न था किंतु उग्रनाम साहबके परिवार-वालोंको द्वेष और प्रायः खुशामदी लोगोंके कारण मुझे उससे अलगही रहना पडा और प्रेसके प्रुफोंको देख देनेके सिवाय मेरा उससे कोई संबन्ध नहीं रहा यहाँ तक कि, मैंने उसमें जो कुछ छपवाया सो भी मूल्य देकर.