भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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[ शब्दावली—

इस प्रकार ग्रन्थ छपना आरम्भ हुआ और लगभग आधे तक छप गया कि, दामाखेडेमें शादी विवाह आमद रफत उलट फेरकी तूफान चली और प्रेस बन्द हो गया। शादी विवाह हो गया बिछडे मिले खूब धमाचौकडी मची और उसीमें मुझे वहां से दामाखेडा हमेशेके लिये छोडना पडा। पश्चात् उग्रनाम साहबका देहान्त हुआ। राज्य पलटा और फ्रान्स जर्मनीकी लडाई शुरू हुई, देशमें सब प्रकारकी वस्तुएं महंगी हो गयीं, खास तौरसे प्रेसकी वस्तुओंकी कीमत चौगुनी हो गयी। उसी समय असली साठे उन्नीस हजारकी लागतका प्रेस जिसकी कीमत लडाईके समय, साठ सत्तर हजारसे कम नहीं थी, तीन चार हजार तक दाम मिलते हुए भी, केवल नौ सौमें एक मुसलमानको, दया नाम साहब और उनके निकट वतियों द्वारा दे दिया गया। शब्दावली लगभग आधा छपकर अधूरी रह गयी। कई वर्षोंके पश्चात् एक टेकधारी सज्जनने बम्बईवाली प्रतिके ऊपरसे छपे हुए फार्मोंको साथ लेकर उसी विके हुए प्रेसमें छपाकर बारह रुपया मूल्यसे प्रसिद्ध किया और मजा यह कि, आपने भी कवीर साहबके ऊपर कृपा करके उन्हें ग्रन्थकर्ता करके प्रसिद्ध किया “यजमान जावे नर्कमें या स्वर्गमें पुरोहितको तो हलुए मांडेसे गर्ज” के अनुसार—कवीरके नाम पर धब्बा आता हो या कुछ हमें तो नाम और रुपया चाहिये।

इन्हीं बातोंको देखकर कतिपय स्वधर्मी और इतर सज्जनोंके अनुरोधसे मुझे ग्रन्थ प्रकाशनकी ओर लौटना और जन्म भरके परिश्रम स्वरूप हजारों कवीरपंथी ग्रन्थोंमेंसे जहां तक छप सके उनके छपवानेके प्रयत्नके लिये फिर बम्बई आना पडा है।

प्रथमवार बम्बई छोडते समय, हस्त लिखित और छपे ग्रन्थोंकी कई पेटियां बम्बईमेंही छोड गया था किन्तु, १०।१२ वर्षतक उनकी खोज खबर न लेनेके कारण वे सब दीमकके गालमें चले गये। उन पेटियोंमें हाथके लिखे कितने ग्रन्थ थे—केवल शब्दावलीकेही भिन्न भिन्न स्थानों और ग्रान्तोंकी लिखी हुई १५-२० प्रतियां थीं। ऐसी दशामें संतोष करके कलेजा मसोसके रहना पडा है।

इतना होनेपर भी शब्दावलीकी २०।२५ प्रति मेरे पास इस समय भी उपस्थित है। जिनमेंसे ५।७ प्रतियां तो इन्दौर उज्जैन मारवाड कानपुर आदि स्थानोंसे २।३ महीनेके अन्दरही संग्रह किया है। जिन २ लोगोंने अपनी अपनी